आइये हर्ष मनाऐं, नई जिम्मेदारियाँ निभाऐं। (Time for celebrations! Time for newer responsibilities!)

आइये हर्ष मनाऐं, नई जिम्मेदारियाँ निभाऐं। (Time for celebrations! Time for newer responsibilities!)

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आप दोनों को माता-पिता बनने पर हार्दिक शुभकामनायें। आपका प्रिय अंश इस दुनिया में प्रवेश कर चुका है। जन्मदाता बन जीवन देनें की खुशी शब्दों में व्यक्त नहीं की जा सकती। किंतु, हर्षोल्लास के इस माहौल में आप नई जवाबदारियाँ निभाने के लिए तैयार हो जाइये।

एक जागरुक पालक के रुप में कृप्या  अपने शिशु रोग विशेषज्ञ से उक्त चर्चा अवश्य करें-

  • शिशु की कुशलक्षेम।
  • जन्मजात विकृति।
  • स्तनपान।
  • टीकाकरण।
  • शिशु की समोचित देखभाल जैसे स्नान, लपेटना, निद्रा इत्यादि।

तैयार रहें, कल तक आपकी कोख में सुरक्षित इस नन्हें जीव को अब बाह्य दुनिया के अनेकों घातक तत्वों और संक्रमणों से नित सामना करना पड़ेगा।

अवश्य एक जिम्मेदार पालक के रुप में आप  अपने शिशु को हर संभव तरीके से संपूर्ण सुरक्षा प्रदान करना चाहेंगें।

निश्चिंत रहें। माँ के दुग्ध में उपस्थित इम्युनोग्लोबिन/ ऐंटिबॉडी नामक विशिष्ट प्रोटीन तत्व शिशु को जन्मोपरांत भी अगले 6-8 सप्ताह की उम्र तक घातक संक्रमणों से सुरक्षा प्रदान करते हैं। हालांकि, शिशु को प्राणघातक संक्रमणों से समोचित सुरक्षा प्रदान करने का सर्वश्रेष्ठ माध्यम है टीकाकरण के माध्यम से उक्त संक्रमण के प्रति सक्रीय प्रतिरोधक क्षमता को विकसित करना।
टीके संक्रमक सूक्ष्मजीवियों से प्राप्त विशिष्ट रसायन या निष्क्रिय हानि-रहित सूक्ष्मजीव  होते हैं, जिनमें शरीर की प्रतिरोधक कार्यप्रणाली  को उत्तेजित करने की क्षमता तो होती हैं, किंतु रोग उत्पादक क्षमता का क्षरण किया जा चुका होता है।

विश्व स्वास्थ्य संघटन के अनुसार, नवजात शिशु को जन्मोपरांत अतिशीघ्र उक्त टीकाकरण सुझावपूर्ण है।

टीका खुराक रोग के प्रति सुरक्षा
बी.सी.जी टीका एकल खुराक ट्यूवरक्यूलोसिस (क्षय रोग)
हेपाटॉयटिस बी टीका प्रथम खुराक हेपाटॉयटिस-बी
ओरल पोलियो ड्रॉप जीरो/ जन्म खुराक पोलियो

1- ट्यूबरक्यूलोसिस (क्षयरोग)।

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विश्वभर में प्रतिवर्ष लगभग 1 मिलियन शिशु क्षयरोग से ग्रसित होते हैं, जिनमें से प्रायः 10%  का पर्याप्त चिकित्सा के अभाव में निधन हो जाता है।

क्षयरोग प्राथमिक रुप से मॉयकोबेक्टेरियम ट्यूबरक्यूलोसिस नामक जीवाणु के द्वारा फेफड़ों का संक्रमण है जो अंततः शरीर के अन्य अंगों को जैसे आंतें, मस्तिष्क, अस्थियां-जोड़, लसिका ग्रंथी, चमड़ी इत्यादि सभी को प्रभावित कर सकता हैं।

क्षयरोग ग्रसित मरीज़ के थूक और श्वास से फैलता है। एक बार संक्रमण के पश्चात् इसके जीवाणु रोगी के शरीर में वर्षों तक सुप्तावस्था में वास कर सकते हैं और कुपोषण, एच.आई.वी., गंभीर रोग, तनाव, कीमोथैरेपी इत्यादि के परिणामस्वरुप जैसे ही शरीर की प्रतिरोधक क्षमता क्षीण होती है, जीव पुनः जागृत हो रोग उत्पन्न कर सकते हैं।

गरीबी, गंदगी, अधिक जनसंख्या, प्रदूषित वातावरण, जानकारी का अभाव इत्यादि क्षय रोग की संभावना को बढ़ाते हैं।

बी.सी.जी. टीका-

बी.सी.जी. (बैसेली कैल्मेट ग्यूरिन) टीका मायकोबेक्टेरियम बोविस नामक हानि-रहित जीवित नस्ल से निर्मित होता है जो शरीर में प्रविष्ट होने के पश्चात हानिकारक जीव के प्रति भी प्रतिरोधक क्षमता विकसित करता हैं।

खुराक-

जन्मोपरांत प्रथम 72 घंटों में या 6 सप्ताह की आयु पर अन्य टीकों के साथ।

टीकाकरण की पद्दती-

विशिष्ट सीरिंज के माध्यम से कंधे पर त्वचा के निम्न स्तर पर लगाया जाता है।

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टीकाकरण के पश्चात प्रभाव-

टीकाकरण के 2-3 सप्ताह पश्चात, उक्त स्थान पर एक फुंसी विकसित होती है, जो तद्पश्चात् 4-8 मि.मी. के आकार ग्रहण कर विस्फारित हो अगले 6-12 सप्ताह में निशान छोड़कर ठीक हो जाती है।

टीकाकरण के दुष्प्रभाव-

लगभग 1-5 प्रतिशत नवजात शिशुओं में टीकाकरण से कुछ दुष्प्रभाव संभव हैं, जैसे-

  • इंजेक्शन के स्थल पर दीर्घकालीन छाला।
  • लसिका ग्रंथी में संक्रमण और मवाद।
  • अस्थि संक्रमण।
  • कदाचित संपूर्ण शरीर का संक्रमण और 1 मिलियन शिशुओं में से किसी एक में आकस्मिक मृत्यु।

टीकाकरण वर्जित-

चूंकि, बी.सी.जी के टीके में हानि-रहित किंतु जीवित सूक्ष्मजीव होते हैं, अतः वे विकार जो शरीर की प्रतिरोधक क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं, जैसे- गर्भावस्था, एच.आई.वी., ब्लड कैंसर, संक्रमित चर्मरोग, एक्ज़ीमा, दीर्घकालीन रोग, प्रतिरोधक क्षमता पर दुष्प्रभाव डालने वाली दवाईयाँ इत्यादि की स्थिति में बी.सी.जी का टीकाकरण वर्जित होता है, ताकि स्वयं जीवित हानि-रहित जंतु भी रोग उत्पन्न ना कर दें।

2- हेपाटायटिस-बी।

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हेपाटायटिस-बी, लिवर संबंधित एक भयंकर, संक्रामक रोग है, जो कि हेपाटायटिस-बी नामक विषाणु के माध्यम से फैलता है। व्यस्कों में यह अधिकांशतः सीमित व न्यूनतम दुष्प्रभाव छोड़ स्वतः ठीक हो जाता है। किंतु कई मरीजों में यह लिवर को व्यापक क्षति पहुँचाकर स्थाई दुष्क्रिया या लिवर कैंसर उत्पन्न कर सकता है।

विश्वभर में लगभग 2 बिलियन लोग कभी ना कभी इस रोग से ग्रसित हो चुके हैं, जिनमें से अंदाजन 350 मिलियन रोगियों में इसके विषाणु शरीर में आश्रय ले, अन्य लोगों को संक्रमित करते हैं। लगभग 6 मिलियन रोगी प्रति वर्ष इस असाध्य रोग से असमय मर जाते हैं।

प्रसार-

यह विषाणु संक्रमित रोगी के रक्त या अन्य स्त्राव के संपर्क में आने से फैलता है, जैसे इंजेक्शन, ब्लड ट्राँसफ्यूशन, खून चूसने वाले जीवाणु या यौन संबंध के माध्यम से, या जन्म के समय माता से शिशु को।

हेपाटायटिस बी टीका-

चूंकि हेपाटायटिस-बी एक असाध्य रोग है, इसके प्रति टीकाकरण ही इसके विरुद्ध सर्वश्रेष्ठ माध्यम है।

टीका हेपाटायटिस-बी विषाणु के सतही प्रतिजन से निर्मित होता है। संक्रमित माता के नवजात और अस्पताल के कर्मचारी जिनका संपर्क भूलवश संक्रमित रक्त से हुआ है, उन्हें टीके के संग ही इम्यूनोग्लोबिन के माध्यम से अतिरिक्त सुरक्षा प्रदान की जानी चाहिए।

खुराक-

जन्म, 1 माह और 6 माह की आयु पर।

टीकाकरण की पद्दति-

इंजेक्शन प्रायः शिशु की जाँघ के बाहरी भाग पर लगाया जाता है, जहां पर्याप्त माँसपेशी होती हैं।

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टीकाकरण के दुष्प्रभाव-

  • इंजेक्शन के स्थान पर पीड़ा और सूजन।
  • जी मचलाना, बुखार, लगातार रोना इत्यादि।

टीकाकरण वर्जित-

हेपाटायटिस-बी के टीके के घटक के प्रति एलर्जी ही एकमात्र परिस्थिति है, जब टीकाकरण वर्जित होता है। यह टीक गर्भावस्था और दुग्धपान में भी सुरक्षित है। इसे अन्य टीकों के साथ बिना किसी हस्तक्षेप के लगाया जा सकता है।

3- पोलियो।

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पोलियोमाईलायटिस स्थाई विकलांगता उत्पन्न करने वाला एक घातक रोग है जो पोलियो नामक विषाणु के माध्यम से फैलता है। प्राथमिक रुप से यह खाद्य पदार्थों के माध्यम से आंतों को संक्रमित करता हैं, तद्पश्चात् केंद्रिय नाड़ी तंत्र में फैल कर स्थाई अपंगता और 1 प्रतिशत रोगियों में तो प्राण घातक भी हो सकता है।

इसके प्रति प्रभावी और सफल टीकाकरण के परिणामस्वरुप ही विगत समय की इस वैश्विक महामारी का आज अधिकांश देशों से पूर्णतः उन्मूलन संभव हो सका है। शीघ्र ही यह मात्र स्माल पॉक्स (छोटी माता) की तरह इतिहास बन कर रह जाएगी।

मानव इस विषाणु का एकमात्र स्त्रोत्र है और यह विषाणु प्रदूषित खाद्य पदार्थ, जल और मक्खियों के माध्यम से फैलता है। अस्वच्छता, भीड़-भाड़, गरीबी, तनाव, प्रतिरोधक क्षमता के विकार इत्यादि पोलियो संक्रमण की संभावना को बढ़ाते हैं।

पोलियो टीका-

पोलियो एक असाध्य रोग है। अतः इसके प्रति प्रभावी टीकाकरण ही इसकी रोकथाम का एकमात्र उपलब्ध साधन है।

पोलियो के प्रति दो प्रकार के टीके उपलब्ध हैं-

  • इंजेक्टेबल पोलियो वैक्सिन।
  • ओरल पोलियो वैक्सिन।

इंजेक्टेबल पोलियो वैक्सिन-

यह टीका प्राणहीन, जड़ पोलियो विषाणु के अवशेष से निर्मित होता है।

खुराक-

नियमावली के अनुसार शिशु को जन्मोंपरांत 6, 10, 14 सप्ताह और 1 वर्ष की आयु पर माँसपेशियों में टीके के कुल चार इंजेक्शन लगाए जाते है। तदुपरांत 18 वर्ष की आयु तक प्रत्येक 5 वर्षों में बूस्टर खुराक दी जाती है।

टीकाकरण की पद्दती-

जांघ के अग्र-बाह्य भाग में जहाँ माँस अधिक घना होता है, इंजेक्शन सरलता से लगाए जा सकते हैं।

इंजेक्टेबल पोलियो वैक्सिन रक्त में प्रभावशाली प्रतिरोधक क्षमता की उत्पत्ती के माध्यम से केंद्रिय नाड़ी तंत्र पर दुष्प्रभाव और अपंगता के प्रति तो सुरक्षा प्रदान कर सकता है, किंतु आंतों के पुनः संक्रमण को नहीं रोक सकता।

टीके के दुष्प्रभाव-

  • इंजेक्शन स्थल पर दर्द और सूजन।
  • मतली, बुखार, निरंतर रोना, चिड़चिड़ाहट इत्यादि।

टीकाकरण वर्जित-

इंजेक्टेबल पोलियो वैक्सिन के घटक के प्रति एलर्जी ही एकमात्र परिस्थिति है, जब टीकाकरण वर्जित होता है। प्राणहीन, जड़ पोलियो विषाणु के अवशेष से निर्मित होने के कारण यह टीका निम्न प्रतिरोधक क्षमता से ग्रसित शिशुओं में भी लगाया जा सकता है।

ओरल पोलियो वैक्सिन।

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ओरल पोलियो वैक्सिन हानि-रहित जीवित नस्ल से निर्मित होता है जो आंतों के माध्यम से शरीर में प्रविष्ट होने के पश्चात हानिकारक जीव के प्रति भी प्रतिरोधक क्षमता विकसित करता हैं। यह सस्ती और सरलता से दी जा सकती है। इससे सबसे बढ़ा लाभ, निष्क्रिय विषाणुओं के मल के माध्यम से फैलने के परिणामस्वरुप व्यापक स्तर पर सामूहिक प्रतिरोधक क्षमता का विकास है, जो अप्रत्यक्ष रुप से उन लोगों को भी सुरक्षा प्रदान करता है जिनका टीकाकरण ना हुआ हो।

खुराक-

“दो बूंद जिंदगी की।”

प्राथमिक टीकाकरण में शिशु को दो बूंद जन्म पर, तद्पश्चात् 6,10 और 10 सप्ताह पर पिलाई जाती है। विश्व स्वास्थ्य संघटन के निर्देशानुसार वे राष्ट्र जिनने अपने राष्ट्रीय टीकाकरण नीति में मात्र ओ.पी.वी. को संलग्न किया है, उन्हें शिशु को अतिरिक्त क्षमता प्रदान करने के लिए 14 सप्ताह की आयु पश्चात एक आई.पी.वी का इंजेक्शन देना चाहिए।

ओ.पी.वी. के दुष्प्रभाव-

अधिकांशतः ओ.पी.वी. के कोई भी दुष्प्रभाव नहीं होते है। कदाचित 2.4 मिलियन में से 1 में जीवित विषाणु में अवांछनीय परिवर्तन के परिणामस्वरुप वैक्सिन संबंधित पोलियों का लकवा होने का भय रहता है।

ओ.पी.वी. वर्जित-

चूंकि, बी.सी.जी के टीके में हानि-रहित किंतु जीवित सूक्ष्मजीव होते हैं, अतः वे विकार जो शरीर की प्रतिरोधक क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं, जैसे- गर्भावस्था, एच.आई.वी., ब्लड कैंसर, संक्रमित चर्मरोग, एक्ज़ीमा, दीर्घकालीन रोग, प्रतिरोधक क्षमता पर दुष्प्रभाव डालने वाली दवाईयाँ इत्यादि की स्थिति में बी.सी.जी का टीकाकरण वर्जित होता है, ताकि स्वयं जीवित हानि-रहित जंतु भी रोग उत्पन्न ना कर दें।

“टीकाकरण कर अपना दायित्व पूरा करने की कृपा करें,

आइये घातक रोगों से अपने शिशु की सुरक्षा करें ।”

सूचनाः

उक्त जानकारियाँ गर्भावस्था और शिशुपालन संबंधित विषयों पर सामाजिक जागरुकता पैदा करने हेतु साझा की गई हैं, ताकि, उनकी सुरक्षा सुनिश्चित कर माँ एवं शिशु मृत्यु दर कम की जा सके। लेखक द्वारा सर्वश्रेष्ठ प्रयास किया गया है, कि दर्शाई गई जानकारियाँ प्रामाणिक स्त्रोत्र से सही प्राप्त की गई हों। हालांकि उन के पालन से पहले अपने स्वास्थ अधिकारी से अवश्य चर्चा करें। 



Time for celebrations! Time for newer responsibilities!

Heartiest congratulations! Your tiny little angel has stepped into this world. The eternal happiness of being proud parent can never be expressed into words.

But, be prepared to shoulder your new responsibilities.

As a parent we request you to kindly consult your attending Pediatrician and discuss about baby’s

  • Baby’s wellbeing.
  • Congenital anomaly, if any.
  • Breast feeding.
  • Vaccination
  • Baby care like bathing, swaddle, sleeping pattern etc.

The little baby has stepped out from the most secured world of mother’s womb into this world full of various harmful substances and infections.

As a parent, you may definitely want to ensure the safety of your baby at all fronts in best possible ways.

Your baby would be protected from the diseases for atleast 6-8 weeks passively by the special proteins called Immunoglobins/Antibodies that are present in the breast milk. However, the most effective and time tested modality to protect your child from lethal diseases is to actively prepare your child’s immune system to fight against them through vaccination.

Vaccines are chemical agents obtained from disease causing microorganism or their toxins. When injected into the body, they stimulate the body’s immune system to develop immunity against a particular disease.

According to the World health organization, the newborn should receive the following vaccines soon after birth.

Vaccine Dose Protection against disease
BCG Single dose Tuberculosis
Hepatitis B vaccine 1st dose Hepatitis B
OPV 0/birth dose Polio

1- Tuberculosis:

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Around 1 million children suffer from tuberculosis every year of which 10 % children die to improper treatment.

It is caused by Mycobacterium Tuberculosis bacteria that primarily affects lungs but subsequently  any part of the  body like intestines, brain, bones and joints, lymph nodes, skin etc.

It usually spread through the sputum of the infected patient. The patient once infected may harbor the bacteria in their body for years, with resurgent of disease when the immunity wanes for any reason like malnutrition, HIV, stress, chemotherapy, chronic illnesses etc.

Poverty, poor sanitation, poor housing and overcrowding population, large families, unawareness increases the risk of infection.

BCG vaccine:

BCG stands for bacilli Calmette Guerin, a non-harmful strain of tuberculosis derived from Mycobacterium bovis that when injected as live attenuated vaccine induces immunity to fight against the virulent mycobacterium tuberculosis.

Dose:

It is administered at birth or at 6 weeks with other vaccines.

Method of administration:

It is injected intradermal with tuberculin syringe on shoulder.

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Response after vaccination:

2-3 weeks after vaccination, a papula develops at injection site that gradually increases to 4-8 mm in size, subsequently ulcerates and then heals in 6-12 weeks leaving a scar.

  • Adverse affects of vaccination:

Approximately 1-5 % newborn may experience some complications-

  • Prolonged severe ulceration at the site of injection.
  • Lymph node infection with pus.
  • Bone infection leading to osteomyelitis.
  • Rarely, disseminated disease and death in less than one out of 1 million children.

Contraindication of vaccination:

Since, the BCG vaccine is a live attenuated vaccine, it is not recommended in persons with deficient immunity like pregnancy, HIV infection, blood cancers (leukemia), infective skin disorders or generalized eczema, chronic illness, chemotherapy or immune-suppressive therapy etc.

2-Hepatitis B:

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Hepatitis B is considered as one of the most infectious disease caused by Hepatitis B Virus that primarily damages the liver leading to chronic liver failure and liver cancer. In adults usually it is an acute self limiting infection, which may or may not produce symptoms.

More than 2 billion people worldwide have evidence of past or current HBV infection and around 350 million are chronic carriers harboring the virus in liver and causing around 6 lacs deaths annually.

Human are the only reservoir of HBV and it transmits through either inoculation of infected blood through needle prick, injectable drug abuse or blood transfusion, Perinatal transmission from mother to child during birthing, Sexual transmission and occasionally through blood sucking vectors.

HBV vaccine-

Since there is no specific treatment of HBV infection, prevention through immunization is the main target.

The vaccine contains surface antigen of HBV which may be derived either from the purification of the plasma of infected patients or by recombitant DNA technology.

The newborn of infected mothers or health care personnels with accidental exposure are immediately offered additional passive immunity against perinatal infection by Hepatitis B Immunoglobin.

Dose of vaccine:

The vaccine is given at birth, 1 and 6 months,

Method Of Administration:

Preferably at anterolateral aspect of thigh in children due to higher muscle mass there.

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Adverse reactions to vaccine:

  • pain, redness and swelling at injection site.
  • nausea, fever, persistent cry etc.

Contraindication of vaccine:

The only contraindication of HBV vaccine is the history of allergic reactions to any of the vaccine’s components. Neither pregnancy nor lactation is the contraindication for its vaccination.

The HBV vaccine does not interfere with immune response to any other vaccine and hence can be given as combined vaccine.

3-Polio-

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Poliomyelitis is an acute viral infection caused by Polio virus known for its permanent disability. It primarily infect intestinal tract but eventually attack Central nervous system in around 1% cases leading to varying degree of permanent paralysis and possibly death.

The availability and extensive use of effective vaccine against polio virus has now nearly eradicated this lethal disease from most part of the world. Polio would soon become a history like the small pox.

Human are the only reservoir for the Polio virus and it mainly spreads by faeco-oral route through contaminated food, water and flies.

Poor sanitation, overcrowding, poverty, fatigue, stress, Immunity deficiency disorders etc. predisposes to Polio infection.

Polio Vaccine:

There is no effective treatment of Polio virus and hence, prevention through immunization is the only means to combat.

There are two types of vaccines:

  • Injectable inactivated Polio vaccine (IPV).
  • Oral live attenuated Polio vaccine (OPV)

Injectable Polio Vaccine:

The injectable vaccine produces circulating antibodies in blood and effectively protect from paralytic polio, but does not prevent reinfection of gut by virus.

Dose:

The primary dose includes 4 intramuscular injections at 6,10,14 weeks and 1 year of birth. The booster doses are then advocated prior to school entry and then every 5 years until the age of 18.

Method of administration:

Preferably at anterolateral aspect of thigh due to higher muscle mass and ease of injection.

Adverse effects of IPV:

  • Pain, redness and swelling at injection site.
  • Nausea, fever, persistent cry, drowsiness etc.

Contraindications:

The only contraindication of IPV is the history of allergic reactions to any of the vaccine’s components.

Due to use of inactivated virus, this vaccine can be safely used in children with immune-deficiency disorders.

Oral Polio Vaccine:

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It contains live attenuated strains of Polio virus that when administered primarily infect intestinal cell, spread to blood and then activates immune response.

The advantages of OPV is low cost, easy administration, no technical limitation, local immunity, offers herd immunity through excretion of non-virulent virus in feces.

Dose:

The primary dose includes, 2 drops at birth and then three doses at 6,10 and 14 weeks of age. The WHO recommends that all countries using only OPV to add atleast 1 dose of IPV to the schedule after 14 weeks of age once maternal antibodies wane to increase effectiveness.

Adverse Effects:

OPV has no side effects.

Rarely Vaccine associated Paralytic Polio (VAPP) may occur in 1 out of 2.4 million cases in vaccine recipient or their contact due to mutant live virus.

Contraindication:

The OPV is live attenuated virus and hence should not be administered in babies with immunodeficiency, leukemia, chemotherapy or steroid therapy etc.

“Fight against lethal diseases with ease,

Get your child vaccinate please!”

Disclaimer:

The information is shared to create awareness towards Pregnancy and Childcare to reduce maternal and child deaths. At most care has been taken by the author to include the verified information from authentic sources. However, kindly discuss the same with your health care provider before implementation.