क्या पारिवारिक क्लेष और वसीयत बँटवारे के बीज को पनपने से रोका जा सकता है?

क्या पारिवारिक क्लेष और वसीयत बँटवारे के बीज को पनपने से रोका जा सकता है?

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अनेक खुशहाल परिवारों को समय के साथ पारिवारिक क्लेष, मनभेद और अर्थपिपासा के फलस्वरुप विखंडन और जायदाद विभाजन का दंश झेलते देखा है। दो भाइयों के मध्य आपसी सद्भाव, प्रेम और सम्मान की कोर्ट कचहरी में धज्जियाँ उड़ते देखा है?
क्या विभाजन की इस हृदयविदारक, अप्रिय घटना के बीज को पनपने से रोका जा सकता है?
अगर हम गहराई में जायेंगें तो पायेंगे कि मनभेद, ईर्ष्या और स्वार्थ का यह रोग जो अनेक परिवारों को क्षणः क्षणः खंडित करता है उसकी शुरुआत तब नहीं होती जब हम व्यस्क हो लौलुपी और स्वार्थी हो जाते हैं। किंतु वास्तव में उसका बीज तो तब ही बो जाता है जब दूसरा शिशु गर्भ में आता है और प्रथम शिशु को यह हीन भाव होता है कि उससे हर चीज छीनी जा रही है।
अतः जो विभाजन हम परिवार में बाद में झेलते हैं वह तो उस बीज से पनपा वृक्ष मात्र होता है।
मनुष्य सदैव खोने के अनिश्चित भय से ग्रसित रहता है। उसे हमेशा यह मोह रहता है, कि, जो भी उसके स्वामित्व में है, वह उससे कोई छीन या बांट ना ले।
वह शिशु जिसने होश संभालते से अपने आप को परिवार का आकर्षण का केंद्र महसूस किया। वह जो वर्तमान समय तक सबका राज-दुलारा था, उसे ना केवल अपने माँ का आँचल व पिता की गोद बांटना पड़ती है, किंतु उसे अचानक अनेकों निर्देशनों की सूची थमा दी जाती है। संपूर्ण परिवार नए सदस्य की आवभगत में जुट जाता है और इस खुश नुमा वातावरण में अनजाने ही कब इस कोमल मन में अवसाद का बीज पनपने लगता है, पता ही नहीं चलता?
होश संभालने पर धीरे-धीरे यही भाव अनुज भाई के मन में भी घर कर जाता है, जब वह यह अहसास करता है कि पारिवारिक निर्णय लेने में माता-पिता द्वारा अग्रज भाई को ज्यादा महत्व दिया जाता है क्योंकि वह उम्र में बढ़ा है।
यहीं से प्रारंभ होती है, विरासत की असली जंग। एक दूसरे को बेहतर साबित कर हक छीनने की लड़ाई।

गर्भवती माँ व पिता को गर्भावस्था में यह विशेष ध्यान रखना चाहिए, कि, वे प्रथम शिशु को यह अहसास करवा सकें कि नया मेहमान उसकी खुशियाँ भागित नहीं, वरन् कई गुणा बढ़ाने आ रहा है। माता-पिता के रूप में वे तो मात्र डाकिए हैं, जो ईश्वर से उस खिलौने को उस तक पहुँचाने का कार्य कर रहें हैं। वास्तव में वही उस नन्हें साथी का असली रक्षक है। प्रथम शिशु को यह अहसास होने दें कि, यह खिलौना अन्य खिलौने से भिन्न व विशेष है, जो उसकी बात पर प्रतिक्रिया भी दे सकता है।
कुछ बातें दोनों बच्चों में एक मजबूत भावनात्मक सेतु बनाने में मददगार सिद्ध हो सकती हैं। जैसे:-
• गर्भावस्था में दौरान अगर संभव हो तो नियमित परिक्षण के दौरान प्रथम शिशु को भी अस्पताल ले कर जाऐं व जब डॉक्टर बच्चे की धड़कन सुनाए तो उससे कहें कि वह उसे अभिवादन कर रहा है। इससे उसे गौरांवित व खुश महसूस होगा।
• हर छोटे-बढ़े निर्णय जैसे नए कपड़े या खिलौने खरीदने में रंगो का चयन इत्यादि में प्रथम शिशु की भागीदारी उसे और जवाबदार बना देती है।
• प्रथम शिशु को एक बार यह निर्देष दें कि, कोई भी बिना हाथ धोए, या उचित साफ सफाई का पालन किए बिना छोटे बालक को गोद में नहीं लेगा। तद्पश्चात्, वह स्वयं यह ध्यान रखने लगेगा कि परिवार का कोई भी सदस्य इसका उलंघन ना करें। यह उसे शिशु का रक्षक बनने की प्रेरणा देगा।
• रोज प्रथम शिशु को कहें कि सोने से पूर्व वह एक कहानी या स्कूल में सीखी अच्छी बात अपने नन्हें साथी को बताये। इससे दोनों के मध्य भावनात्मक जुड़ाव बढ़ता है।
• छोटे भाई को भी होश संभालने पर यह अहसास करवायें कि उसके जन्म और इस परिवार में स्वागत हेतु अग्रज भाई ने ही उन्हें प्रेरित किया था। अतः उसे अपने बढ़े भाई के प्रति कृतज्ञ और आभारी रहना चाहिए।
• दोनों भाइयों को एक-दूसरे के प्रति समभाव और प्रेमभाव रखने के लिए प्रेरित करें। और एक दूसरे का सहायक बनने पर उन्हें पुरस्कृत भी करें।
•उनके मध्य किंचित भी क्लेष या मनभेद भाव विकसित होने पर उसका शीघ्रतम निराकरण करें। चिंगारी बुझाना सरल है, आग नहीं।

शायद छोटी-छोटी पहल से हम अनेकों परिवार को विखंडन से बचा एक खुशहाल समाज के स्वप्न को साकार कर सकें।