गर्भावस्था में शारीरिक कार्यप्रणाली में परिवर्तन (Physiological changes in Pregnancy)

गर्भावस्था में शारीरिक कार्यप्रणाली में परिवर्तन (Physiological changes in Pregnancy)

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गर्भावस्था के दौरान शिशु के उचित विकास व माँ को प्रसव हेतु तैयार करने के लिए माँ के शरीर में अनेक परिवर्तन होते हैं। कुछ परिवर्तन पूरे नौ माह के अंतराल होते हैं, जबकि कुछ विशिष्ट तिमाही में ही। इन परिवर्तनों व विभिन्न रोगों के लक्षण का अंतर बहुत मामूली होता है और अचानक आए ये परिवर्तन रोग प्रतीत हो सकते हैं। इस अंतर का ज्ञान हमें ना केवल अनावश्यक तनाव से बचा सकता है, किंतु समय रहते रोग के प्रारंभिक लक्षण से आगाह कर उचित उपचार में मदद कर सकता है।

वजन

गर्भावस्था में साधारणतः माँ के वजन में एकल शिशु में 11 से 16 किलो व जुड़वा बच्चे में 15 से 20 किलो तक वृद्धि होती है।

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प्रथम तिमाही में लगभग 1 किलो ग्राम तक बढ़ोतरी होती है, या फिर विकासशील शिशु के लिए अधिक आवश्यक मेटॉबालिज्म  के परिणामस्वरुप वजन 1 किलो तक कम भी हो सकता है। तद्पश्चात प्रत्येक द्वितीय एवं तृतीय तिमाही में 5 किलो तक वजन बढ़ता है।

पाचन तंत्र

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  • भूख:
    गर्भावस्था में शिशु के उचित विकास के लिए प्रति दिन माँ को अतिरिक्त 300 किलो कैलोरी की उर्जा की आवश्यकता होती है, अतः माँ की भूख बढ़ना स्वाभाविक है। माँ को गर्भावस्था के दौरान सरलता से पचने वाले पौष्टिक आहार का सेवन करना चाहिए।तृतीय तिमाही में गर्भाशय के पेट व आंतों पर बढ़ते दबाव के कारण थोड़ा ग्रहण करने पर भी पेट भरा प्रतीत होता है व भूख शीघ्र शांत हो जाती है, किंतु कुछ समय पश्चात् पुनः भूख लगती है। अतः हर थोड़े नियमित अंतराल से कुछ ना कुछ खाद्य सेवन करना सुझावपूर्ण होता है।
  • मतली:
    विभिन्न रसायनों विशेषतः प्रोजेस्ट्रॉन हार्मोन के प्रभाव में ना केवल मस्तिष्क में उपलब्ध मतली का केंद्र उत्तेजित हो जाता है, बल्कि आहार नाल व पेट के बीच की मांसपेशियों का दबाव कम होने से आहार पुनः ऊपर की ओर आकर मतली पैदा करता है।अधिकांशतः मतली प्रथम तिमाही में होती है, ताकि माँ गलती से ऐसी कोई खाद्य पदार्थ का सेवन ना कर ले जिसके निर्माणाधीन अंगों पर प्रतिकूल प्रभाव से शिशु के विकृति या गर्भपात का भय हो। प्रायः यह चौथे माह में ठीक हो जाती है।आहर नली में बढ़े रक्त प्रवाह के कारण सामान्यतः कभी कभी खून की मतली हो सकती है।अगर मतली की तीव्रता अस्वाभाविक रूप से अत्याधिक है, कि, माँ को पानी या आवश्यक तत्वों की कमी होने के कारण शारिरिक कमजोरी हो रही हो, पेशाब का रंग गाढ़ा पीला और मात्रा औसतन 400 मि.लि. प्रति दिन से कम हो या माँ का वजन 5 प्रतिशत तक कम हो गया हो तो उसे हायपरऐमेसिस ग्रेविडेरम (Hyperemesis Gravidarum) कहते हैं, व उसे यथाशीघ्र उपचार की आवश्यकता है। एक से अधिक गर्भ होने के कारण जब हार्मोन अधिक मात्रा में उत्पन्न हों तो यह समस्या बढ़ जाती है।

मतली कम करने के सुझाव –

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  1. प्रातः खाली पेट मतली ज्यादा होती है। अतः माँ प्रातः उठते से 1 कप दूध के साथ दो बिस्किट व टोस्ट का सेवन करने के पश्चात् ब्रश करती है, तो उसे मतली का अनुभव कम होता है।
  2. यह देखा गया है कि, गर्भावस्था में कई बार विशेष गंध या स्वाद से मतली अधिक होती है। अतः उत्तेजक तत्वों, अत्याधिक तेल/ वसा युक्त, तीखे या अपचनीय पदार्थों का सेवन ना करने से मतली को रोका जा सकता है।
  3. नियमित अंतराल में थोड़ा – थोड़ा खाद्य सेवन करने से फायदा होता है।
  4. भोजन के संग अत्याधिक पानी पीने के बजाय बीच के अंतराल में भरपूर पानी का सेवन करने से मतली कम भी होगी व पानी की कमी भी नहीं होगी।
  5. बाहर का खाद्य/पेय पदार्थ से टॉयफाईड या हैजा जैसे संक्रमण का भय होता है व उनसे मतली की समस्या बढ़ सकती है। अगर कभी भी घर से दूर जाने का अवसर हो तो सदैव उपने संग पानी व भोजन की वयवस्था करके चलना चाहिए।
  6. ईलायची, लौंग या चूसने वाली संतरे की गोली से मतली कम हो जाती है।
  • अम्ल व छाती जलन:
    विकासशील शिशु व गर्भाशय के पेट व आंतो पर दबाव बढ़ने के कारण भोजन पुनः पलट कर आहार नली में जाने से अम्ल व छाती जलने की शिकायत बढ़ जाती है। वसायुक्त व तीखे भोजन के कम सेवन व भरपूर पानी ग्रहण करने से अम्ल की तीव्रता कम की जा सकती है।
  • कब्ज व बवासीर:
    रसायनों के प्रभाव में शरीर की सभी मांसपेशियों में ढीलापन आ जाता है। छोटी व बड़ी आंत की मांसपेशियों की गति धीमी होने से भोजन की अग्रसर गति कम हो जाती है व कब्ज की शिकायत बढ़ जाती है। ऐसे में गर्भाशय के बढ़ते दबाव के कारण मल द्वार पर जोर पड़ने से बवासीर की शिकायत बढ़ जाती है। रेशेदार सब्जियों, फल व पानी के उचित सेवन से कब्ज व बवासीर से बचा जा सकता है। श्रोणीतल की मांसपेशियों की ‘कीगल‘ नामक व्यायाम व शौचालय में अधिक देर बैठने की आदत बदलने से बवासीर की तकलीफ कम की जा सकती है।
  • पीलिया व पिताशय की पथरी:
    मांसपेशियों का ढीलेपन के कारण, उदर व पिताशय में स्त्राव का प्रवाह धीमा हो जाता है, अतः पीलिया व पिताशय की पथरी की समस्या गर्भावस्था में बढ़ जाती है। उदर द्वारा निर्मित रसायनों की रक्त में मात्रा बढ़ने से गर्भावस्था में इन रोगों के पहचानने में भी मुश्किल होती है।अगर पीलिया के कारण माँ के मस्तिष्क एवं अन्य अंगों में प्राण घातक दुष्प्रभाव उत्पन्न हो रहें हैं तो समय पूर्व प्रसव सुझाव पूर्ण हो सकता है।
  • मसूड़ों से रक्त स्त्राव:
    गर्भावस्था में सभी अंगों में रक्त का प्रवाह बढ़ जाता है, अतः मसूड़ों व नाक से खून आना साधारण है। प्रतिरोधक क्षमता कम होने के कारण मुख के संक्रमण व रोग बढ़ जाते हैं। पेट का अम्ल वापस आने के कारण दांतों के क्षरण की संभावना भी बढ़ जाती है।

मूत्र तंत्र-

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  • गर्भावस्था में दोनों किडनियों का आकार व उनका रक्तप्रवाह बढ़ जाता है। कार्य क्षमता में वृद्धि द्वारा अवयवों के अधिक निष्कासन के कारण किडनीयों के द्वारा निष्कासित होने वाले अवयव जैसे क्रियेटनीन व यूरिया की मात्रा रक्त में कम हो जाती है। प्रकृति ऐसा इसलिए करती है, ताकि, शिशु के शरीर में पैदा होने वाले अतिरिक्त अवयवों को भी माँ आसानी से बाहर निकाल सके।
  • बच्चे को सुगमता से बिना किसी रूकावट के रक्त प्राप्त हो सके अतः हार्मोन के प्रभाव में सोडियम की मात्रा रक्त में बढ़ जाती है, ताकि रक्त में पानी का अनुपात बढ़ा सके।
  • इन्हीं हार्मोन के प्रभाव में पेशाब एकत्र करने वाली नलियों (Pelvicalyceal system and ureters) में ढीलापन आने के कारण पेशाब का प्रवाह धीमा पड़ने से संक्रमण व पथरी की संभावना बढ़ जाती है।
  • प्रथम व तृतीय तिमाही में पेशाब की थैली पर गर्भाशय के दबाव के कारण बार-बार पेशाब लगने की समस्या सामान्य लक्षण है। कई बार इस कारण से हँसते-खाँसते पेशाब भी छूट जाती है। ‘कीगलस्‘ नामक श्रोणीतल की माँसपेशियों के संकुचन का व्यायाम ना केवल पेशाब छूटने की समस्या से निदान दिला सकता है, बल्कि नार्मल डिलेवरी में भी मदद कर सकता है।
  • चूंकि, पेशाब व योनी के संक्रमण से समयपूर्व प्रसव या गर्भपात का खतरा बढ़ जाता है, अतः महिलाओं को जननांग साफ सुथरा व सूखा रखना चाहिए। विशेषतः पेशा उपरांत योनी को पहले कपड़े फिर टिष्यू पेपर से सूखा रखना चाहिए, नियमित अण्डरवियर बदलना चाहिए, धोने पश्चात् उसे धूप में सुखाना चाहिए व पहनने से पहले प्रेस करना चाहिए, जननांग के केश को छोटा रखना चाहिए व सामूहिक स्थलों पर संडास के प्रयोग से जहां तक संभव हो तो बचना चाहिए।

 श्वास  तंत्र-

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  • गर्भवती माँ व विकासशील शिशु की अतिरिक्त प्राणवायु (आॅक्सीजन) की आपूर्ति व उत्पन्न दूषित कार्बन डायआॅक्साईड के शरीर से निकास हेतु श्वास तंत्र को अधिक कार्य करना पड़ता है। अतः श्वास की गति व तीव्रता दोनों ही बढ़ जाती है। इसके विपरीत, 6 वे माह पश्चात् गर्भाशय के बढ़ते दबाव से महाप्रचीरा पर्दा (Diaphragm) ऊपर विस्थापित होने से फेफड़ों की क्षमता कम हो जाती है।उच्च रक्त प्रवाह के कारण नथुनों व श्वास तंत्र की अंदरूनी परत में थोड़ी सूजन सामान्य है। इन्हीं सब कारणों से गर्भवती महिला श्वास लेने में दिक्कत, बलगम व नाक से रक्त के रिसाव से ग्रसित हो सकती है।
  • दमें की समस्या कुछ हद तक गर्भावस्था में और बिगड़ जाती है। व माँ को शिशु को घातक नुकसान से बचाने के लिए चिकित्सक की सलाह से दवाइयों में उचित बदलाव करना पड़ सकता है।

 हृदय व रक्त संचार तंत्र-

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  • गर्भावस्था के दौरान माँ व भ्रूण को सरलता से रक्त के माध्यम से पौष्टिक तत्व प्राप्त हो सके व दूषित तत्व माँ के निकास तंत्र के माध्यम से बाहर निकाला जा सके इसके लिए अधिक किंतु तरल रक्त प्रवाह की आवश्यकता होती है।
  • अतः रक्त वृद्धि मेें कोशिकाओं के मुकाबले पानी का अनुपात अधिक मात्रा में बढ़ता है, ताकि रक्त तरल रह सके। इसे हीमोडायल्यूशन आॅफ प्रेग्नेंसी (Hemodilution of Pregnancy) कहते हैं।
  • किंतु, अगर माँ का हीमोग्लोबिन 10 ग्राम प्रतिशत से कम होता है, तो उसे खून की कमी (Anemia) माना जाता है। विश्व स्वास्थ संगठन द्वारा प्रस्तावित आयरन की गोलियों के अतिरिक्त माँ को लौह युक्त भोजन जैसे हरी सब्जियाँ, सलाद, अंकुरित दानें, पिंड खजूर, किशमिश, गुड़, मूंगफल्ली इत्यादि का सेवन करना चाहिए। विटामिन सी सेवन लौह सोकनें की क्षमता बढाता है। वहीं दूध व अम्लविरोधी दवाईयां उसकी उपलब्धता कम करती हैं, अतः आयरन की गोली चाय, दूध आदि के साथ नहीं लेनी चाहिऐं।
  • गर्भावस्था में आवश्यक 30-40 प्रतिशत अतिरिक्त रक्त के सुगम संचार हेतु हृदय की कार्य क्षमता व गति में भी समोचित बढ़ोतरी होती है। इस वृद्धि से उच्च रक्त चाप व इसके घातक परिणाम ना हो इसलिए, हार्माेन के प्रभाव में रक्त धमनियों का ढीलापन (Vasodilation) व उनकी समायोजन क्षमता (Capacitance) बढ़ जाती है और प्रवाह अवरोध (Peripheral Resistance) कम हो जाता है।
  • सीधे पीठ के बल लेटने पर विकासशील गर्भाशय द्वारा शरीर के निम्न भाग से वापस लौटने वाले रक्त के अवरोध से, पैरों में थोड़ी सूजन सामान्य है। इस अवरोध के कारण शिशु को प्रवाह कम ना हो इसलिए, माँ को करवट पर सोना चाहिए। सोते समय पाँव के नीचे तकिये लगाने से गुरूत्वाकर्षण से सूजन कम हो जाती है। लंबे समय पाँव लटकाने की अवस्था में नियमित पंजो का व्यायाम करते रहना चाहिए।
  • निम्न रक्त धमनियों पर दबाव के कारण गर्भवती महिलाओं में पैरों में नसों का फूलना (Varicose Veins) पैरों में खून के थक्के जा जमना (Deep Vein Thrombosis) और बवासीर की समस्या हो सकती है।
  • गर्भावस्था में कई लक्षण जैसे साँस फूलना, जल्दी थक जाना, तेज धड़कन, ई.सी.जी. में परिवर्तन व अतिरिक्त प्रवाह के कारण हृदय में असाधारण आवाज इत्यादि कई बार हृदय रोग की शंका पैदा करते हैं।
  • हृदय रोगियों में रक्त मात्रा में वृद्धि व प्रवाह में परिवर्तन के कारण कई बार गर्भावस्था व प्रसव के दौरान हार्ट फेल एवं हृदयघात की संभावना रहती है।
  • हृदय संबंधित कुछ दवाईयाँ जो खून पतला करने के लिए दी जाती हैं, उनके द्वारा शिशु में विकृति होने की संभावना होती है। अतः ऐसे में महिला को अपने हृदय व स्त्री रोग विशेषज्ञ दोनों की सलाह से ही गर्भधारण करना चाहिए।
  • कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में जब गर्भावस्था में माँ को जान का खतरा होता हैं, गर्भपात भी करवाना पड़ सकता है।
  • गर्भावस्था में शिशु में पिता के कणों के प्रति संवेदना के कारण साधारणतः श्वेत कणों की मात्रा बढ़ जाती है।
  • प्रसव के दौरान माॅ को अत्याधिक रक्त स्त्राव से बचाने के लिए, माॅ में खून गाढ़ा करने वाले तत्व बढ़ जाते है। अतः माँ में मस्तिष्क व पैरों में खून का थक्का बढ़ने की संभावना अधिक होती है। इससे बचाव के लिए गर्भवती महिलाओं को नियमित व्यायाम करना चाहिए एवं भरपूर पानी का सेवन करना चाहिए।

ग्रंथि तंत्र –

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  • अण्डकोशिकाओं, कनेरी व तद्पश्चात् शिशु द्वारा उत्पन्न ईस्ट्रोजन व प्रोजेस्ट्रॉन नामक हार्मोन संपूर्ण गर्भावस्था व प्रसव के दौरान अहम भूमिका निभाते हैं। वे शिशु के विकास के साथ व माॅ के शरीर को भी उचित तैयारी करने में मदद करते हैं। उनकी संकुचन रोधक क्षमता गर्भपात व समयपूर्व प्रसव से सुरक्षा करती हैं।
  • शिशु के संपूर्ण विकास विशेषकर मानसिक विकास व गर्भावस्था में माँ की अतिरिक्त शारिरिक व मानसिक कार्यक्षमता के सुचारू संचालन हेतु थायराईड हार्मोन की आवश्यकता बढ़ जाती है, व उत्पादन करने वाली थायराईड ग्रंथि का आकार बढ़ जाता है।
  • थायराईड हार्मोन की कमी व अत्याधिक मात्रा दोनों में ही माॅ व शिशु के स्वास्थ पर विपरीत असर व गर्भपात का डर बढ़ जाता है। थायराईड स्टीमूलेटिंग हार्मोन की रक्त में मात्रा लगभग 0.7 से 2.5 आई.यू. के मध्य होनी चाहिए।
  • उर्जा के स्त्रोत्र के रूप में शिशु केवल ग्लूकोज़ पर आश्रित होता है। अतः माँ की कोशिकाऐं इंसुलिन हार्माेन के प्रति असंवेदनशील (Insulin Resistance) हो जाती है, ताकि, माँ का शरीर ग्लूकोज़ को न्यूनतम उपयोग करे ताकि वह आसानी से शिशु को उपलब्ध हो सके। किंतु, यह परिवर्तन अनियंत्रित होने पर शर्करा (Gestational Diabetes) का खतरा बढ़ा देता है, जो शिशु व माँ दोनों के लिए हानीकारक है।
  • अतः गर्भावस्था में माँ को नियमित अंतराल से पौष्टिक भोजन ग्रहण करना चाहिए, व अत्याधिक मीठे या वसायुक्त भोजन से बचना चाहिए।
  • अगर योनी से रक्त स्त्राव ना हो रहा हो तो, बिस्तर पर पूर्ण आराम से बचना चाहिए। नियमित व्यायाम व चलना सेहत के लिए लाभप्रद होता है।

प्रजनन तंत्र-

  • गर्भाशयः

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सामान्यतः गर्भाशय का आकार 7*5*3 से.मी. ,वजन 70 ग्राम व क्षमता मात्र 10 मि.लि. होती है। किंतु गर्भावस्था के दौरान हार्मोन के प्रभाव व बढ़ते भ्रूण के दबाव के कारण फैल कर इसका आकार व क्षमता बढ़ कर इतनी हो जाती है, कि, यह लगभग 3 किलो के भ्रूण, 1.2 लीटर पानी व आधा किलो की कनेरी को सरलता से समाहित कर लेता है।माॅसपेशियों की आकार व संख्या में बढ़त व उन्नति के कारण नौ माह के अंत तक इसका वजन अंदाजन 1 किलो होता है। भ्रूण व कनेरी को अतिरिक्त रक्त प्रदान करने के लिए, गर्भाशय का रक्त प्रवाह 50 मि.लि. प्रति मिनिट से दस गुना बढ़ कर लगभग 500 मि.लि. प्रति मिनिट तक हो जाती है।

वक्षस्थल-

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प्रसवोपरांत शिशु के लिए दूध की आवश्यकता हेतु गर्भावस्था के दौरान दुग्ध ग्रंथियों की संख्या व आकार दोनों में वृद्धि होती है। स्तन में परिवर्तन के कारण पीड़ा व भारीपन और पानी समान स्त्राव सामान्य है।

माँ को सूती ढीले कपड़े व ब्रेज़री पहनना चाहिए।

सूचनाः

उक्त जानकारियाँ गर्भावस्था और शिशुपालन संबंधित विषयों पर सामाजिक जागरुकता पैदा करने हेतु साझा की गई हैं, ताकि, उनकी सुरक्षा सुनिश्चित कर माँ एवं शिशु मृत्यु दर कम की जा सके। लेखक द्वारा सर्वश्रेष्ठ प्रयास किया गया है, कि दर्शाई गई जानकारियाँ प्रामाणिक स्त्रोत्र से सही प्राप्त की गई हों। हालांकि उन के पालन से पहले अपने स्वास्थ अधिकारी से अवश्य चर्चा करें। 



 


 

Physiological changes in Pregnancy

Baby is entirely dependent for its nourishment on mother. To ensure the proper growth and development of the baby and safeguard the health of both, mother and baby, many physiological changes happen in mother’s body. Some of these changes continue to happen throughout the period of pregnancy, while some are limited to specific trimester.

Some of these sudden changes may adversely affect the quality of life and may mimic as disease symptoms. There exists a very fine line of demarcation between the upper limit of physiological changes and early signs of disease/ complications. The awareness towards normal changes in pregnancy and warning signs may help us to diagnose any deviation from normal and undertake intervention well in time to protect both mother and baby.

Weight:

The average weight gain in singleton pregnancy is around 11-16 kg and in twin gestation it is around 15-20 kg.

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In the first trimester there is usually around 1 kg weight gain. However, some mothers may lose little weight in first trimester due to increased metabolism. In the second and third trimester there is approximately 5 kg gain in each. Therefore average 11 kg weight gain in entire duration of pregnancy.

Digestive System:

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  • Nausea:

This is one of the most common problems in first trimester. The progesterone hormone not only stimulates the vomiting center in brain, but also relaxes the Gastro-esophageal sphincter resulting in reflux of stomach contents.

Nature has probably designed the nausea and vomiting in first trimester of pregnancy as a protective mechanism to safeguard the baby from accidental ingestion of harmful substances during the period of organ development.

Excessive vomiting resulting in approximately more than 5 % weight loss, decreased urine output less than 400 cc in 24 hours and electrolyte imbalance is referred as Hyperemesis Gravidarum and needs immediate intervention.

The simple remedies to control nausea and vomiting are discussed in section on common problems in pregnancy.

  • Diet & Appetite:

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The pregnant mother requires additional 300 kcal of energy per day. Therefore mother should increase her food intake. She should preferably consume easily digestible food rich in nutrition, proteins and minerals.

  • Early satiety:

In the third trimester, as the size of gravid uterus increases, it displaces the intestines and stomach upward and causes compression pressure on them. This results in early satiety with little meal, but frequent hunger.

  • Bleeding at gums or vomiting:

In pregnancy, there is increased blood flow to all the organs of the body. This may result in bleeding from gums, nose or in vomiting even with trivial trauma.

  • Hyperacidity & Heart burn:

The progesterone hormone relaxes the gastro-esophageal sphincter. Also, the progressive growth of gravid uterus displaces the intestines upward resulting in reflux. Hence, the pregnant mothers are more prone for hyperacidity and heart burn.

  • Constipation:

The progesterone hormone relaxes the smooth muscles of small intestines and reduces the peristalsis resulting in slow bowel movement and hence constipation.

  • Hemorrhoids:

The higher incidence of constipation and increased intra-abdominal pressure due to gravid uterus on the perineum predisposes to the risk of hemorrhoids in pregnancy as it advances.

  • Jaundice & Gall bladder stones:

The progesterone hormone also relaxes the smooth muscles of biliary system resulting in accumulation of bile products in liver and gall bladder predisposing to the risk of cholestasis (Jaundice) or gall stones respectively.

  • Recurrent oral infections:

The changes in pH of oral secretions, low immunity associated with pregnancy and gastro-esophageal reflux results in dental caries and recurrent oral infections.

Oral infections may increase the risk of preterm delivery.

Recommended life style modifications to handle these problems have been discussed in respective sections of common problems.

Urinary system:

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  • In pregnancy, the blood circulation to kidney increases resulting in higher glomerular filtration rate efficiently clearing waste. As a result, the concentration of urea and creatinine in blood is lower than in non-pregnant state. The nature has designed it so that the waste products transports from fetus to mother following principles of diffusion (from higher fetal concentration to lower maternal concentration).
  • The concentration of sodium in mother’s blood increases under the influence of hormones, so that mother’s blood retains the water to facilitate hemodilution of pregnancy to permit easy flow of blood to baby.
  • The progesterone hormone also relaxes the smooth muscles of urinary system, resulting in urine stasis, predisposing to recurrent urinary infections or stone formation.
  • In the first and third trimester, the urinary bladder gets compressed between the gravid uterus and symphysis pubis bone leading to increased urinary sensation and frequency.
  • The increased intra-abdominal pressure due to gravid uterus predisposes to pelvic organ prolapse and urinary leakage on laugh, cough or bending forward.
  • The lower immunity in pregnancy along with persistent perineal moisture due to increased vaginal secretions and failure to wipe the perineum dry after urination predisposes to recurrent vaginal and urinary infections, that adversely may lead to miscarriage or premature delivery.

Finer details of perineal hygiene are discussed in the segment of ‘white discharge in Pregnancy’.

Respiratory System:

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The oxygen demand in pregnancy increases to ensure the optimum growth and development of fetus and to meet out the increased metabolic demands of pregnant mother.

As a result, the respiratory system has to work more to ensure the adequate supply of oxygen and take away the waste carbon dioxide gas. So, both the rate and intensity of respiration increases in pregnancy.

However, as the pregnancy advances, the gravid uterus displaces the intestines upwards subsequently displacing the diaphragm and reducing the lung capacity, thereby causing shortness of breath.

The increased blood supply to inner lining of nostrils, respiratory tract and lungs can lead to congestion resulting in breathlessness and increased respiratory efforts and occasional bleeding from nose on forceful sneezing.

Due to changes in hormones and immunity, the Asthma may worsen in some mothers and medicines may be changed accordingly to safeguard both mother and fetus.

Heart and blood circulation system:

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During pregnancy the metabolic requirement of growing fetus and host mother is very high. The baby is entirely dependent on mother for both, its nutritional requirements and excretion of wastes. To facilitate increased blood supply to the baby, there is increased demand on mother’s heart and circulatory system.

To ensure adequate blood flow certain adaptive changes happen in mother’s blood and blood vessels.

  • Hemodilution of Pregnancy:

The volume of liquid plasma rises by 40-50%, as against 30-40% increase in Red blood cells, resulting in lower viscosity of blood to facilitate easy blood flow. This is called as Hemodilution of Pregnancy. But, if the hemoglobin drops below 10gm% then it is considered as Anemia and requires intervention.

  • Vasodilation:

Under the influence of hormones, the blood vessels dilate to accommodate additional volume of around 1.5-2.0 liters of blood.

  • Heart function:

The heart pumps at faster rate with more intensity, efficiently increasing the cardiac output by 30-40%.

  • Lower Blood Pressure:

In spite of additional 2 liters of blood in circulation and increased cardiac activity, the blood pressure is maintained at lower limit. This happens as a result of dilatation of blood vessels resulting in increase in the capacity and reduction of peripheral resistance.

The blood pressure is lowered-

  • To facilitate efficient exchange of nutrients and waste products between fetus and mother.
  • To protect fetus-placental apparatus from pressure injuries.
  • Swelling in lower limbs:

The gravid uterus interferes with the return of blood flow from the lower extremities that may result in swelling in lower limbs. Prolong hanging down the legs and restricted mobility may further increase the swelling. However, physiological swelling improves with rest, limb elevation and limb exercises.

  • Blood coagulation:

Under the influence of hormones, the liver produces more coagulation factors predisposing to clot formation. The nature has designed it to prevent heavy blood loss during delivery. However, those patients who have genetic risk of hypercoagulability and are on prolonged bed rest may develop deep vein thrombosis, which is a fatal condition.

  • ECG:

The heart is displaced upward and laterally towards left, subsequently resulting in changes in ECG that can be misinterpreted as abnormal.

  • Changes in White blood cell count:

The immune system of mother is activated towards the father’s antigen in baby. This increases the WBC count. Hence, the upper normal limit during pregnancy is 15,000/cubic mm as against 10000. Only above that should be considered as infection.

What is supine hypotension syndrome?

Sleeping straight on dorsal position may lead to compression of inferior vena cava by the gravid uterus and decrease in return of blood to heart resulting in drop in maternal blood pressure, compromising maternal-fetal blood circulation. This is called as Supine Hypotension syndrome!

Hence, it is advisable to sleep in lateral positions with proper support of pillow.

The normal changes of pregnancy, such as shortness of breath, easy fatigability, malaise, palpitations (feeling own heart beat), ECG changes etc may unnecessary create suspicion of a heart disease. Hence, it needs proper evaluation to differentiate between the two.

Does pregnancy increases the risk of heart diseases?

Yes, the increased workload on heart due to increase in blood volume and cardiac activity predisposes to risk of heart failure.

Endocrine (Hormone) System:

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  • Ovary, placenta and later baby produce estrogen and progesterone hormones to support and safeguard pregnancy and childbirth.
  • To ensure the overall development of the baby and to meet the increased metabolic demand of pregnancy, the requirement of thyroid hormones increases and as a result, there is increase in size and function of thyroid gland. The normal range of Serum Thyroid stimulating hormone is between 0.7-2.5 IU/L.
  • The baby is entirely dependent for its calorie requirements on glucose. To ensure the uninterrupted supply of glucose-
    • Mother develops insulin resistance so that she consumes less glucose.
    • Placenta produce insulinase enzyme to destroy insulin.
    • Increased glucose production from fats and proteins.

The alteration in glucose metabolism increases the risk of development of gestational diabetes.

Reproductive System

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Uterus:

The non pregnant uterus is around 7x5x3 cms weighing approximately 70 grams and has a capacity of around 10 ml. Under the influence of hormones and growing fetus during the pregnancy, the uterus grows in size and capacity to easily accommodate a baby of 3 kg, amniotic liquor of 1 liter and placenta of 500 grams and weighs around 1 kg.

The blood supply during pregnancy increases from 50 ml/min in non pregnant state to around 500ml/min to facilitate optimum growth and development of fetus.

Breast:

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The estrogen and progesterone hormone promotes growth and development of breast tissue to prepare it for lactation.

The pain and discomfort in breast during pregnancy is a normal complaint. Occasionally under the effect of hormones, there can be production and secretion of little watery milk from the breast.

Disclaimer:

The information is shared to create awareness towards Pregnancy and Childcare to reduce maternal and child deaths. Atmost care has been taken by the author to include the verified information from authentic sources. However, kindly discuss the same with your health care provider before implementation.