निःसंतानता (Infertility)

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गर्भावस्था एक अतुलनीय वरदान है। परमात्मा ने प्रजनन के माध्यम से अधिकांश माँ को जन्म देने की अद्भुत क्षमता प्रदान की है। किंतु वे युगल जो संतान-सुख से वंछित रह जाते हैं, उनके लिए निःसंतानता किसी अभिशाप से कम नहीं।

प्रजनन के लिए आवश्यक है कि मासिक चक्र के मध्य में जब परिपक्व अण्डा निष्कासित होता है, तब पति से संसर्ग हो, अण्डा और शुक्राणु दोनों ही उच्च गुणवत्ता के हों, डिम्ब वाहिनियाँ खुली हों, गर्भाशय स्वस्थ हो और शिशु के विकास में सहायक माँ का शरीर स्वस्थ और हार्मोन सामान्य हो।

विश्व स्वास्थ्य संघटन के अनुसार, जब निरंतर 1 वर्ष तक बिना गर्भनिरोधक साधन उपयोग में लिए, अन्य किसी कारण जैसे दुग्धपान के अभाव में, नियमित प्रयास करने के बावजूद यदि युगल गर्भधारण करने में अक्षम हो तो उसे निःसंतानता कहा जाता है।

विश्वभर में लगभग 7-10 प्रतिशत जनसंख्या इससे ग्रसित है।

प्राथमिक निःसंतानता तब कहा जाता है, जब निरंतर 5 वर्षों तक सतत् प्रयासों के बावजूद एक भी जीवित शिशु का जन्म ना हुआ हो, जबकि अवांतर निःसंतानता तब जब पूर्व में अंतिम जीवित शिशु से 5 वर्ष बीत जाने के बाद भी गर्भाधान ना हो रहा हो।

जीवित शिशु के जन्म के अभाव में पूर्ववर्ति गर्भपात व समयपूर्व प्रसव को भी प्राथमिक निःसंतानता की श्रेणी में रखा जाता है।

निःसंतानता का वर्गीकरण-

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पुरुषों में निःसंतानता के क्या कारण होते हैं ?

पुरुषों में प्रजनन क्षमता 25 वर्ष की आयु में श्रेष्ठतम होती है और 40 वर्ष की आयु के पश्चात उसमें क्षरण होने लगता है। पुरुषों में निःसंतानता के मुख्य कारण इस प्रकार होते हैं-

संभोगक्रिया में अरुचि।

  • शारिरिक, मानसिक या भावनात्मक तनावों के कारण संभोगक्रिया में अरुचि वर्तमान परिदृश्य में एक अहम कारण है।
  • दीर्घकालिन गंभीर रोगों के कारण भी संभोगक्रिया में अरुचि हो सकती है।

शिश्न उत्तेजना एवं शीघ्रपतन संबंधित विकार।

  • मानसिक एवं भावनात्मक तनाव की स्थिति में मस्तिष्क एवं हृदय अधिक क्रियाशील होते हैं। उन्हें  अतिरिक्त रक्तप्रवाह की आपूर्ति के परिणामस्वरुप शिश्न को उत्तेजना के लिए आवश्यक रक्त अनुपलब्ध होता है। अतः किसी भी प्रकार का तनाव शिश्न में उत्तेजना संबंधित विकार उत्पन्न कर सकते हैं।
  • दीर्घकालीन गंभीर रोग जो शिश्न में रक्तप्रवाह अवरुद्ध करते हैं जैसे नाड़ी तंत्र संबंधित विकार, मधुमेह, उच्च रक्तचाप इत्यादि ।

Male infertility

प्रजनन मार्ग में अवरोध के कारण वीर्य में शुक्राणुओं का अभाव।

  • परिवार नियोजन के ऑपरेशन के कारण।
  • प्रजनन मार्ग का जन्मजात अविकास।

वीर्य में शुक्राणुओं की अल्पता।

  • आघात के कारण अण्डकोषिका को क्षति।
  • अण्डकोषिका द्वारा शुक्राणु निर्माण प्रेरित करने वाले हार्मोन की अल्पता।
  • बाल्यकाल में मीसल्स (खसरा) व चिकनपॉक्स (चेचक) आदि विषाणुओं के संक्रमण से अण्डकोषिका को क्षति।
  • दीर्घकालीन गंभीर रोग।
  • हानिकारक दवाईयाँ, कीटनाशक और जहरीले पदार्थ।
  • वेरिकोसील नामक विकृत रक्तधमनियों के जंजाल के कारण उच्च तापमान। ( शुक्राणुओं के उचित निर्माण एवं विकास के लिए शरीर के तापमान से लगभग आधा डिग्रि कम तापमान चाहिए। इसलिए पुरुषों की अण्डकोशिकाऐं बाहर कोथों में स्थित होती हैं। अतः भट्टी संबंधित कार्य, अधिक गर्म पानी से स्नान, तंग कपड़े, संक्रमण इत्यादि द्वारा उत्पन्न उच्च तापमान शुक्राणुओं के लिए हानिकारक होता है।)

वीर्य की सामान्य रिपोर्ट?

विश्व स्वास्थ्य संघटन द्वारा 2010 में प्रकाशित नियमानुसार

who sperm analysis

  • अस्पर्मिया – स्खलन में वीर्य का पूर्ण अभाव।
  • हॉयपो स्पर्मिया – स्खलन में वीर्य की अल्प मात्रा।
  • अज़ू स्पर्मिया – वीर्य में शुक्राणुओं का पूर्ण अभाव।
  • ऑलिगो स्पर्मिया – वीर्य में शुक्राणुओं का पूर्ण अभाव।
  • ऐस्थेनो स्पर्मिया- शुक्राणुओं की आगे बढ़ने की क्षमता में त्रुटि।
  • नेक्रो स्पर्मिया – वीर्य में मृत शुक्राणुओं की अधिकता।
  • टेराटो स्पर्मिया – वीर्य में विकृत शुक्राणुओं की अधिकता।
  • पस सेल्स – वीर्य का संक्रमण।

पुरुषों में निःसंतानता का उपचार

कारण उपचार
1- सीधा दोष या शीघ्रपतन अधिकांशतः इसका मूल कारण तनावमय जीवन और आत्मविश्वास की कमी होता है, अतः स्वस्थ जीवन शैली का अनुसरण जैसे पौष्टिक भोजन ग्रहण करना, पर्याप्त जल ग्रहण करना, नियमित व्यायाम करना, पर्याप्त निद्रा, ध्यान, तनावमुक्त जीवन इत्यादि ही इसका सर्वोप्युक्त उपचार है।

लिंग का रक्त प्रवाह बढ़ाने वाली कुछ विशिष्ट दवाईयाँ जैसे सिल्डेनाफिल सॉयट्रेट इत्यादि अल्प समय के लिए दी जा सकती हैं।

*इन दवाईयों के दुष्परिणाम के कारण इनका सेवन चिकित्सक की सलाह से ही किया जाना चाहिए।

2- वीर्य में शुक्राणुओं की कमी
अंडकोशिकाओं में उत्पादन की कमी – स्वस्थ जीवन शैली का अनुसरण जैसे पौष्टिक भोजन ग्रहण करना, पर्याप्त जल ग्रहण करना, नियमित व्यायाम करना, पर्याप्त निद्रा, ध्यान, तनावमुक्त जीवन इत्यादि।

– अगर यह हार्मोनस् की अल्पता के कारण है तो विशिष्ट दवाईयों जैसे टेस्टोस्टेरॉन या क्लोमीफीन सॉयट्रेट इत्यादि की आपूर्ती ।

– अगर यह संक्रमण या मार द्वारा बीजदार सेमिनिफेरस ट्यूब्यूल्स के स्थायी नष्ट होने के कारण है तो कृत्रिम गर्भदान ही इसका उपाय है।

शुक्राणुओं के परिवहन में रुकावट – एपिडायडमिस और वास-डिफरेंस नामक वाहिनियों में रुकावट को शल्यक्रिया द्वारा उपचार किया जा सकता है।
शुक्राणुओं का नष्ट होना उष्णता से शुक्राणु नष्ट होते हैं। अतः

– अत्याधिक गर्म वातावरण से बचना, अत्याधिक मोटे या गर्म कपड़े ना पहनना।

– वजन कम करना।

– वेरिकोसील नामक धमनियों के गुच्छे होने की दशा में शल्यक्रिया से उपचार किया जाता है।

* उपचार संभव ना हो पाने की दशा में कृत्रिम गर्भाधान ही सर्वोपयुक्त उपचार होता है।

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महिलाओं में निःसंतानता के क्या कारण होते हैं?

महिलाओं में 20 से 30 वर्ष की आयु में प्रजनन क्षमता सर्वश्रेष्ठ होती है। तद्पश्चात उसमें कमी आना प्रारंभ हो जाती है और 35 वर्ष की आयु के बाद तेजी से क्षरण होता है। 50 वर्ष की आयु के बाद यह लगभग क्षीण हो जाती है।

महिलाओं में निःसंतानता के कारणों को मुख्यतः निम्न श्रेणियों में वर्गाकृत किया जाता है।

Infertility females

  1. अण्डों की परिपक्वता और उत्सर्ग संबंधित-

सामान्यतः 21 से 35 दिवस में मासिकधर्म प्राप्त करने वाली महिलाओं में क्रमशः सातवें से इकिस्सवें दिन के मध्य अण्डोत्सर्ग होता है। 24 घंटो की अल्पायु में यह अण्डा जननक्षम होता है। इस दौरान इसका मिलाप पर्याप्त स्तर पर शुक्राणुओं से होने पर ही निषेचन होता है।

अण्डोत्सर्ग का अनुमान निम्न तरीकों से लगाया जा सकता है-

  • योनी से थूक समान तरल पदार्थ का स्त्राव, जिसको एक तार की चाशनी समान खींचा जा सकता है।
  • शरीर का तापमान 0.5 डिग्री सेल्सियस अधिक बढ़ना।
  • मार्केट में उपलब्ध अण्डोत्सर्ग सूचक किट की सहायता से पेशाब में हार्मोन के स्तर के आधार पर अनुमान लगाया जा सकता है।
  • लैबोरेटरी में प्रोजोस्ट्रॉन नामक हार्मोन की रक्त में मात्रा के माध्यम से।

निम्न विकार त्रुटिपूर्ण अण्डोत्सर्ग के कारक होते हैं-

  • पॉलिसिस्टिक ओवेरियन सिंड्रोम –

यह महिलाओं में निःसंतानता का सबसे मुख्य कारण होता है। हार्मान की इस समस्या में महिलाऐं मोटापे, अनियमित मासिक धर्म, शरीर पर अत्याधिक बालों, मुहाँसे, बालों के झड़ने, परिवार में मधुमेह इत्यादि से ग्रसित होती हैं और सोनोग्रॉफी में परिपक्व अण्डे के अभाव में बहुतायत छोटे-छोटे अण्डे प्रतीत होते हैं।

  • अत्याधिक शारिरिक या मानसिक तनाव के परिणामस्वरुप मस्तिष्क के हॉयपोथेलेमस नामक भाग की दुष्क्रियता हार्मोन की गड़बड़ी पैदा कर अण्डोत्सर्ग को दुष्प्रभावित कर सकती है।
  • एनेरॉक्सियॉ नरवोसा – इस विकार में महिलाऐं वजन और मोटापा बढ़ने के प्रति अतिसंवेदनशीलता के कारण कम भोजन ग्रहण करती हैं। जिसके परिणामस्वरुप हार्मोन के विकार उत्पन्न होते हैं।
  • अण्डकोशिकाओं में अण्डों की अल्पता के अनेक कारण हो सकते हैं, जैसे – वंशानुगत, जन्मजात, पूर्व में शल्यक्रिया, दीर्घकालीन गंभीर रोग या समयपूर्व रजोनिवृत्ति इत्यादि। 40 वर्ष की आयु उपरांत स्वाभाविकता क्षरण के कारण अण्डे कम होने लगते हैं।
  • रजोनिवृत्ति – लगभग 40 से 50 वर्ष की आयु में अधिकांश महिलाऐं अण्ड-संग्रह की समाप्ती के कारण रजोनिवृत्ति प्राप्त कर लेती हैं। तद्पश्चात स्वयं के अण्डों से गर्भधारण असंभव होता है।

अण्डों की गुणवत्ता व पर्याप्त संग्रहण मापने के लिए वर्तमान में कोई भी पूर्ण जाँच नहीं है। किंतु निम्न जाँचे सहायक होती हैं-

  • मासिकचक्र के 3 से 5 दिवस में फॉलिक्यूलर स्टिम्यूलेटिंग हार्मोन की रक्त में मात्रा।
  • ऐंटिम्यूलेरियन नामक हार्मोन की रक्त में मात्रा।
  • सोनोग्रॉफी के माध्यम से विकासशील अण्डों की गणना।

2- डिम्बवाहिनी संबंधित कारक?

निष्क्रीय व बंद डिम्बवाहिनियाँ शुक्राणु द्वारा अण्डे के निषेचन को अवरुद्ध कर निःसंतानता उत्पन्न करती हैं।

निम्न कारक डिम्बवाहिनियों के विकार पैदा करते हैं-

  • संक्रमण द्वारा डिम्बवाहिनियों की अंदरूनी भित्ती को क्षति।
  • यौन संक्रमण, पूर्व शल्यक्रिया, ऐंडोमेट्रियोसिस इत्यादि के कारण पेट व श्रोणीगुहा में निर्मित रेशों के जंजाल के परिणामस्वरुप डिम्बवाहिनियों की दुष्क्रियता।
  • जन्मजात डिम्बवाहिनियों का विकृत विकास।
  • गर्भाशय में रसौली की गठान के कारण डिम्बवाहिनी का मुख बंद हो जाना।
  • पूर्ववर्ती परिवार नियोजन हेतु नसबंदी।
  • अस्थानिक गर्भाधान या अन्य रोग के उपचार हेतु डिम्बवाहिनियों का शल्यक्रिया द्वारा निकाला जाना।

डिम्बवाहिनियों की सक्रियता निम्न माध्यमों से निर्धारित की जाती है-

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  • हिस्ट्रो-सेल्फिंजोग्रॉफी (एच.एस.जी) – 

उक्त जाँच में ग्रीवामार्ग से गर्भाशय में विशिष्ट डाई डाली जाती है, और पेट में उसका रिसाव एक्स-रे के माध्यम से अध्ययन किया जाता है। जाँच के दौरान महिला को थोड़ दर्द, असुविधा या डाई के रियेक्शन का अनुभव हो सकता है।

  • सलाईन इंफ्युशन सोनोग्रॉफी-

उक्त जाँच में ग्रीवामार्ग से गर्भाशय में नारमल सलाईन डाली जाती है, और पेट में उसका रिसाव सोनोग्रॉफी के माध्यम से अध्ययन किया जाता है। इसमें डाई के रियेक्शन का भय नहीं होता है।

  • डायग्नोस्टिक हिस्ट्रो-लेप्रोस्कोपी –

इस शल्यक्रिया में हिस्ट्रोस्कोप नामक विशिष्ट टेलिस्कोप (दूरबीन) गर्भाशय में और लेप्रोस्कोप नामक टेलिस्कोप पेट में प्रविष्ट कर निःसंतानता के संभव विकारों का विस्तृत अध्ययन और उपचार किया जाता है।

3- गर्भाशय संबंधित विकार –

गर्भाशय भ्रूण के लिए घर निवास प्रदान करता है। गर्भाशय संबंधित निम्न विकार निःसंतानता उत्पन्न कर सकते हैं।

  • जन्मजात गर्भाशय या योनिमार्ग का अभाव या उनके पथ का नगण्य विकास।
  • गर्भाशय या योनिपथ की विकृत संरचना। हांलाकि, इसके कारण निःसंतानता के अनुपात में पुनर्रावृत्ति गर्भपात ज्यादा होने की संभावना होती है।
  • पूर्व की शल्यक्रिया, यौन संक्रमण, क्षयरोग, या पूर्व गर्भाधान के शेष अवयवों के कारण गर्भाशय की अंदरूनी परत में रेशों की उत्पत्ति।
  • गर्भाशय के अंदरुनी भाग में रसौली की गठान या पर्दा।

4- अन्य कारक-

  • यौन संक्रमण के कारण गर्भाशय और डिम्बवाहिनियों की विकृतियाँ एवं अनुचित वातावरण के निर्माण के कारण बार-बार गर्भपात।
  • वंशानुगत एवं गुण-सूत्र संबंधित विकारों के कारण बार-बार गर्भपात।
  • धूम्रपान, जहरीले रसायनिक पदार्थों, कीटनाशक और संक्रमण के कारण अण्डे या शुक्राणुओं के गुण तत्वों में अवाँछनिय परिवर्तन।
  • थॉयराईड, मधुमेह इत्यादि हार्मोन के विकार।
  • दीर्घकालिन गंभीर रोग जैसे, गुर्दे, लिवर संबंधित, क्षय- रोग, कैंसर के उपचार हेतु रेडियोथैरेपी और कीमोथैरेपी इत्यादि।
  • महिला द्वारा शिशु में उपस्थित स्वयं के या फिर पिता के कणों के प्रति अवाँछनिय प्रतिरोधक संवेदनशीलता के कारण भ्रूण का ना पनप पाना। जैसे ऐप्ला सिंड्रोम इत्यादि।
  • थ्रोंबोफिलिया नामक रक्त का थक्का जमने और रक्त गाढ़ा होने का विकार, जिससे शिशु को पर्याप्त रक्त की आपूर्ति अवरुद्ध होती है।

5- अज्ञात कारण –

लगभग 10-20 प्रतिशत युगल में सभी परिक्षण और जाँचों के बाद भी निःसंतानता का कारण निर्धारित करना संभव नहीं होता। संभवतः ये वे कारण है, जिनकी खोज और अनुसंधान अभी बाकी है।

निःसंतानता के दुष्प्रभाव –

भावनात्मक दुष्प्रभाव।

  • असहाय भाव, नकारात्मक विचार, चिड़चिड़पन, अकारण रोना आ जाना एवं आत्मविश्वास की कमी ।
  • आत्मघाती विचार।
  • स्वयं की नारीय क्षमता पर संशय।
  • संभोगक्रिया में अरुचि।
  • शारिरिक अक्षमता, सिर दर्द, घबराहट, छाती में जलन, अपच, अति-अम्लता, उच्च रक्तचाप इत्यादि।

पुरुष प्रधान निःसंतानता की अवस्था में भावनात्मक परिवर्तन और पारिवारिक क्लेष  की संभावना अधिक होती है।

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सामाजिक दुष्प्रभाव।

  • सामाजिक बहिष्कार व एकांकिपन।
  • पारिवारिक क्लेष।
  • तलाक।
  • पारिवारिक सदस्यों के द्वारा महिला का दुराचार।

आर्थिक दुष्प्रभाव।

  • निःसंतानता के उपचार हेतु परिवार पर अनुपातहीन आर्थिक बोझ।

शारिरिक दुष्प्रभाव।

  • शारिरिक अक्षमता, सिर दर्द, घबराहट, छाती में जलन, अपच, अति-अम्लता, उच्च रक्तचाप इत्यादि।
  • निःसंतानता के उपचार हेतु लगने वाले हार्मोन के इंजेक्शन के दुष्प्रभाव।

उपचार

निःसंतानता का समोचित उपचार अनेक बातों पर निर्भर करता है, जैसे महिला एवं पुरुष की उम्र, निःसंतानता की अवधि, संभावित कारक इत्यादि।

उपचार के तत्व-

  1. पारिवारिक परामर्श एवं सलाह।
  2. स्वस्थ जीवनशैली, पौष्टिक भोजन, नियमित व्यायाम, नियंत्रित वजन के माध्यम से उचित हार्मोन के वातावरण का प्रयास।
  3. प्रजनन सहायक तकनीक।
  • अंतर्गर्भाशयी गर्भाधान (Intrauterine Insemination)

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प्रेरक दवाईयों की सहायता से अण्डों और गर्भाशय की अंदरूनी परत के उचित विकास के पश्चात विशिष्ट तकनीक द्वारा वीर्य से प्रथक किए गए स्वस्थ शुक्राणुओं को खास सीरींज के माध्यम से गर्भाशय में प्रविष्ट किया जाता है। इस तकनीक में अण्डों का निषेचन सामान्यरूप में डिम्बवाहिनियों में ही होता है।

  • इन विट्रो फर्टिलाईज़ेशन (टेस्ट ट्यूब बेबी)( Invitro fertilization)

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प्रेरक दवाईयों की सहायता से अनेक अण्डों को विकसित कर उन्हें शरीर से बाहर निकाल कर शुक्राणुओं द्वारा निषेचित किया जाता है। फिर एक या दो सर्वश्रेष्ट प्रारंभिक भ्रूणों को पुनः गर्भाशय में स्थापित किया जाता है।

ICSI तकनीक के माध्यम से शुक्राणु के गुणसूत्र सीधे अण्डे में प्रविष्ट किए जाते हैं।

  • अण्डे या शुक्राणु के पूर्णतः अनुपयोगी होने की अवस्था में, उन्हें अन्य किसी और से दान लेकर गर्भाधान किया जा सकता है।
  • गर्भाशय के अनुपयोगी होने की अवस्था में सरोगेसी के माध्यम से किसी और का गर्भाशय उधार लेकर भ्रूण को उसमें स्थापित किया जाता है।

निःसंतानता के उपचार की सफलता का मापदंड जीवित शिशु के जन्म से माना जाता है, जो कि मात्र 40 से 50 प्रतिशत ही है।

इस कम सफलता काे ऐसे समझा जा सकता है, कि यदि हम 100 बीज बोते हैं तो कुछ में कोपल भी नहीं फूटेगी, कुछ पौधे या झाड़ी बन सूख जायेंगे और मात्र 40 -50 ही वृक्ष बन पायेंगे। जिस प्रकार उस बीज का विकास अनेक कारणों पर निर्भर करेगा, जैसे उस बीज की अंदरूनी क्षमता, उसकी संरचना, प्राप्त सुरक्षित वातावरण इत्यादि, ठीक वैसे ही भ्रूण का विकास भी उसके समोचित गुणसूत्र, संरचनात्मक विकास, गर्भाशय एवं हार्मोन का वातावरण, माता से आँवल द्वारा प्राप्त पोषण इत्यादि पर निर्भर करेगा।

प्रकृति का नियम सरल है – “योग्यतम को ही जीने का हक है।” वह भ्रूण, जो सर्वांगीण विकास के काबिल है, वही इस जगत में जन्म ले पाता है, ताकि योग्य की उत्पत्ति के माध्यम से जीव की प्रजाति जिंदा रह सके।

सूचनाः

उक्त जानकारियाँ गर्भावस्था और शिशुपालन संबंधित विषयों पर सामाजिक जागरुकता पैदा करने हेतु साझा की गई हैं, ताकि, उनकी सुरक्षा सुनिश्चित कर माँ एवं शिशु मृत्यु दर कम की जा सके। लेखक द्वारा सर्वश्रेष्ठ प्रयास किया गया है, कि दर्शाई गई जानकारियाँ प्रामाणिक स्त्रोत्र से सही प्राप्त की गई हों। हालांकि उन के पालन से पहले अपने स्वास्थ अधिकारी से अवश्य चर्चा करें। 



 

Infertility

Pregnancy is a wonderful gift. Almighty has bestowed many women with the miraculous power to give birth to a life. For couples, who are not blessed with their progeny, Infertility is no less than a curse.

For a woman to conceive – intercourse must take place around the time when an egg is released from her ovary. Husband’s and her reproductive system should be functional at optimum levels. She should have patent tubes to allow fertilization of eggs and a normal womb with balanced hormonal milieu to harbor the fetus for nine months.

According to the World health organization, “Infertility is defined as the failure to achieve a clinical pregnancy after 12 months or more of regular unprotected sexual intercourse in the absence of any other reason, such as breastfeeding or postpartum amenorrhoea.

Worldwide around 7-10 percent of couple are affected by Infertility.

Primary infertility is labeled when the couple has never had a successful live birth inspite of in union for five years without any contraception. However, Secondary infertility is defined as the absence of a live birth for women who desire a child and have been in a union for at least five years since their last live birth, during which they did not use any contraceptives.

The obstetric history of still born and spontaneous miscarriages is not considered as pregnancy and such patients are also considered into primary infertility. Thus the distinguishing feature is whether or not the couple has ever had a pregnancy which led to a live birth.

What is responsible for Infertility?

infertility causes


 

male infertility english

What are the causes of Infertility in Males?

Male fertility peaks usually at age 25 and declines after age 40. The various causes of male infertility are categorized into –

Loss of libido.

  • Physical, mental, emotional and psychological stress resulting in change of preferences and lack of interest in sexual activity.
  • Pathological causes due to chronic physical illness especially neurological & metabolic disorders etc.

Erectile dysfunction & Premature ejaculation.

  • Psychological stress resulting in redistribution of blood to vital organs, depriving sexual organs.
  • Pathological diseases like trauma, neurological, diabetes and hypertensive vasculopathy etc.

male infertility- English

Obstruction of genital tract that carry sperm form testis to penis leading to Aspermia.

  • Vasectomy for family planning.
  • Congenital malformation of genital tract.

Poor quantity or quality of sperms in semen due to testicular insufficiency.

  • Hormonal deficiency.
  • Viral infections like measles or chickenpox in childhood causing testicular injury.
  • Metabolic or chronic physical illness.
  • Pesticides and other environmental toxins
  • Varicocele (network of dilated blood vessels at the base of scrotum) resulting in hyperthermia may contribute in abnormal semen.

(Sperms need lesser temperature for survival, and hence, the testes are placed outside the body safely in scrotal bag. High temperature exposure to testes like furnaces, extremely hot weather, tight clothing, infection/ inflammation or abnormal blood supply etc can adversely affect sperms resulting in male factor infertility.)

What is normal semen analysis report?

According to WHO criteria in 2010.

who sperm analysis

  • Aspermia – Complete lack of semen.
  • Hypospermia – Small semen volume.
  • Azoospermia – Complete absence of sperms in semen.
  • Oligospermia – few sperms in semen.
  • Asthenospermia – reduced progressive sperm motility.
  • Necrospermia – Dead of immobile sperms.
  • Teratospermia – Sperm with abnormal morphology.
  • Pus cells – Presence of infections.

Treatment of Male Infertility

Cause Management
1- Erectile Dysfunction or Premature Ejaculation As the prime reasons for ED and PME is stressful life and lack of confidence, the main treatment is to follow healthy life style like good, nutritious diet, regular exercises, plenty of water intake, adequate rest and sleep, meditation, stress management etc.

Certain medications like Sildenafil Citrate etc can help for limited period.

**As these medicines have side effects, they should only be consumed under medical supervision.

2- Low concentration of Sperm in Semen
Decreased Sperm Production – Healthy life style like good, nutritious diet, regular exercises, plenty of water intake, adequate rest and sleep, meditation, stress management etc.

– In case of Hormonal imbalance, the Testosterone supplement or medications like Clomiphene and Multinutrients may help.

– In case of permanent injury to seminiferous tubules due to infections or trauma, the use of assisted reproduction techniques are the only management.

Obstruction to Sperm migration – The obstruction in passage through Epididymis or Vas Deference is managed by Surgical clearance
Destruction of Sperms As the heat is detrimental to sperms,

– Avoid hot atmosphere, avoid wearing tight & thick cloths.

– Weight loss.

– Varicocele is managed by Surgical excision.

* In case of treatment failure, the use of assisted reproduction techniques are the only management.

 

female infertility english

What are the causes of Female infertility?

Female fertility is high between 20-30 years of age, starts reducing after 30 and drastically falls after 35 with pregnancy occurring rarely after age 50.

The causes of female infertility are classified into –

pickup from 4A940219 Uterus with multiple pathologies affecting fertility MOD: section tube, add polyp, polycystic ovary, blockages, infection Source: Source: Netter, MD., Frank H. Ciba Collection of Medical Illustrations: Reproductive System, Vol 2. "Diseases of the Ovary," Section XI-Plates 2 and 3, page 194-95.

1- Ovulatory causes of Infertility :

In normal menstruating females with 21 to 35 days cycle, the ovulation may occur anytime between 7th to 21st days respectively. The life of released egg is only 24 hours during which the female is most fertile.

The ovulation can be detected by

  • Copious thin mucoid vaginal discharge.
  • Increase in basal body temperature. On the day of ovulation, the BBT may rise by 0.5 degree farenheit.
  • Ovulation predictor kits that detect luteinizing hormone in urine.
  • Progesterone hormone levels in blood. (In laboratory)

Potential causes of anovulation (absence of ovulation) include the following:

  1. PCOS: It is the most common cause of female infertility. It is a hormone problem associated with obesity, irregular menses, excess androgen activity (acne, hirsutism, acanthosis nigricans, hairfall), family history of diabetes mellitus, ultrasound suggestive of polycystic ovaries.
  2. Excessive physical or emotional stress resulting in hormonal imbalance and menstrual irregularity. It is called as Functional Hypothallamic Amenorrhoea.
  3. Anorexia nervosa- A psychological eating disorder characterized by a strong desire to be thin and food restriction due to fear of gaining weight resulting in low weight and subsequently hormonal disturbance.
  4. Diminishedovarian reserve (DOR). This occurs when the ability of the ovary to produce eggs is reduced because of congenital, medical, surgical, Premature ovarian failure or unexplained causes. Ovarian reserves naturally decline with age.
  5. Menopause – it is age appropriate decline in ovarian function that usually occurs between 40 to 50 years of age. After menopause, it is difficult to conceive with self eggs.

The tests that are recommended to access ovarian function:

No single test is a perfect predictor of fertility. However the commonly used tests are:

  • Follicular stimulating hormones on day 3-5 of the menstrual cycle.
  • Anti mullerian hormones.
  • Antral follicle count on transvaginal ultrasonography.

2- Fallopian Tubal causes of Infertility?

Blocked or unhealthy swollen fallopian tubes prevent fertilization of egg resulting in infertility.  The tubes may be affected due to –

  • Damage to inner lining of tubes due to Infections.
  • Intra-abdominal adhesions due to infections, pelvic inflammatory disease, endometriosis, previous surgery etc.
  • Congenital abnormal development of tube.
  • Presence of fibroids (benign tumors) at cornu of uterus.
  • Previous tubal ligation surgery as a family planning.
  • Removal of tubes due to ectopic pregnancy or any other pathology.

The patency of tubes may be evaluated by

infertility investigations

  • Hysterosalphingography (HSG)-

It is an X-ray of the uterus and fallopian tubes. A radiologist injects dye into the uterus through the cervix and simultaneously takes X-ray pictures to see if the dye moves freely through fallopian tubes. This helps evaluate tubal caliber (diameter) and patency. The patient may experience pain, syncope, dye reactions etc.

  • Saline infusion sonography (SIS)-

The patency is checked by infusing normal saline and evaluating under ultrasonography. It is less painful and there is no risk of dye reactions.

  • Diagnostic Hystero-Laparoscopy –

It is a kind of surgery, where a special telescope called laparoscope, is inserted into the abdomen and the inside is visualized. It is often clubbed with diagnostic hysteroscopy (visualization of inner uterine cavity with the help of hysteroscope). The methylene-blue dye is injected into the uterus and tubal patency checked.

3– Uterine causes?

The uterus provides a home to the fetus. The following uterine pathologies may lead to infertility-

  • Congenital absence of uterus/ vagina or their lumen.
  • Abnormal structural development of uterus resulting in bicornuate uterus or septate uterus. Very often these congenital abnormalities lead to pregnancy losses than infertility.
  • Intrauterine adhesions due to previous surgery like D&C, infections like tuberculosis, retained products of conception etc.
  • Presence of intra-cavity or sub-mucous fibroids

4- Miscellaneous causes?

  • Infections – Sexually transmitted diseases can cause infertility by causing PID, blocking fallopian tubes, adverse intrauterine environment and recurrent early pregnancy losses.
  • Genetic factors – Chromosomal and genetic defects can lead to recurrent spontaneous abortions or complete infertility.
  • DNA damage in eggs/ sperms by smoking, radiation, drugs, infections.
  • Hormonal disturbances like Diabetes mellitus, Thyroid diseases etc.
  • Chronic severe diseases like kidney or liver diseases, chronic infections like tuberculosis, chemotherapy/radiotherapy etc.
  • Immunological intolerance due to production of abnormal antibodies against self or husband’s antigen like anti-sperm antibodies, Anti-phospholipid antibody syndrome, etc.
  • Thrombophilia ( abnormality of blood coagulation that increases risk of blood clot formation and poor blood circulation)
  • Toxins such as tobacco, alcohol, pesticides etc.

 5- Unexplained infertility

Up to 10-20% of infertile couples have unexplained infertility. In these cases abnormalities are likely to be present but not detected by current methods.

Effects of Infertility –

Psychological Impact-

  • Emotional distress resulting in hopelessness, helplessness and worthlessness.
  • Suicidal tendency.
  • Loss of control and doubting one’s womanhood.
  • Stigmatization and social isolation.
  • Sexual dysfunction and loss of libido.
  • Psychosomatic diseases like frequent headaches, gastric upset, palpitations, mood swings, high blood pressure, eating disorders etc.

Emotional stress, family disharmony and marital difficulties are greater in couples where the infertility lies with the man.

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Social impact –

  • Social isolation. May be self due to guilt or forced by the society due to prevailing customs.
  • Family disharmony.
  • Increased incidence of forced incest in some families.

Financial impact –

  • The amount money and loss of work hours involved in the treatment of infertility may be exorbitant.

Physical health impact –

  • Psychosomatic diseases like frequent headaches, gastric upset, palpitations, mood swings, high blood pressure, eating disorders etc.
  • The high doses of hormonal injections may sometimes affect adversely.

Treatment-

The management of infertility depends upon the age of the couple, duration of natural attempt, responsible causes and associated factors.

The treatment of infertility includes-

  1. Family counseling.
  2. Healthy life style and optimum weight management to correct hormonal milieu.
  3. Assisted reproductive technologies like

a- Intrauterine Insemination –

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It is the deliberate introduction of male’s healthy sperms achieved by seminal wash into female’s uterus.

The ovulation induction drugs are prescribed to help 1 or 2 eggs grow. When the egg is 20-22 mm large and endometrial thickness is optimum 7 to 9 mm, the prepared sperms are injected into the uterine cavity with the help of special cannula so that the fertilization occurs inside the body.

b- Invitro fertilization –

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The ovaries are stimulated to increase egg production. The maximum possible mature eggs are retrieved and fertilized by sperms outside the body producing embryos. One or more healthy embryos are transferred into the uterine cavity. With the method of ICSI, the DNA of sperm may directly be injected into the egg.

  • When either eggs or sperms of couple are of poor quality, the donor eggs or sperms can be offered.
  • If the womb or body of mother is not suitable to carry pregnancy, the embryo is transferred into a rent out womb that is called as surrogacy.

The success of Infertility treatment is assessed by the rate of live birth. It is only around 40-50 percent.

To understand this low rate of success, let us take an example. If we sow 100 good quality seeds, few would fail to germinate, some would be arrest at plant or bust stage and only around 40-50 percent would attain their potential to become tree. Like seeds, the live birth rate of embryo depends on many factors like, genetic potential of the embryo, its structural development, safe uterine and hormonal environment, optimum nourishment through the placenta etc.

Law is simple – “Survival of the Fittest“. The healthy embryo would find its place in this world by any means, & the progeny would continue

Disclaimer:

The information is shared to create awareness towards Pregnancy and Childcare to reduce maternal and child deaths. Atmost care has been taken by the author to include the verified information from authentic sources. However, kindly discuss the same with your health care provider before implementation.