नैतिक मूल्य – वह सर्वश्रेष्ठ और अनमोल विरासत जो हम अपने बच्चों को दे सकते हैं

नैतिक मूल्य – वह सर्वश्रेष्ठ और अनमोल विरासत जो हम अपने बच्चों को दे सकते हैं

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नैतिक मूल्य सामाजिक रुप से स्वीकृत मान्यताओं और बौद्धिक सिद्धांतों का वह अद्भुत संकलन होता है जो किसी भी व्यक्ति, समुदाय, समाज या राष्ट्र के विचार, व्यक्तित्व, व्यवहार और चरित्र को प्रभावित करते हैं। इनके आधार पर ही हम हर विचार, व्यवहार, घटना, वस्तु इत्यादि को उचित-अनुचित या अच्छे-बुरे में वर्गीकृत करते हैं। नैतिक मूल्य समय-समय पर युग, समुदाय, धर्म, देश, परिस्थितियों इत्यादि के आधार पर सतत परिवर्तन होते रहते हैं।

माता-पिता शिशु के प्रथम गुरु होते हैं। एक पालक के रुप में हमारा ना केवल यह सदैव प्रयास किंतु जवाबदारी भी होती है कि हम अपने बच्चों में सद्विचार, सच्चाई, ईमानदारी, साहस, दृढ़ता, आत्मविश्वास, अनुशासन, परिश्रम, करुणा, न्याय और विवेक जैसे नैतिक मूल्यों को विकसित करें।
नैतिक मूल्य केवल प्रवचन या पाठ से नहीं सिखाये जा सकते। इसके लिए आवश्यक है कि हर वह शख्स जिससे हमारा बच्चा प्रभावित होता है, उन मूल्यों का अनुसरण अपने दैनिक व्यवहार में करें। बच्चे हमारे वास्तविक व्यवहार का बारिकी से अवलोकन और विश्लेषण कर उचित निष्कर्ष के बाद ही उन्हें अपने व्यवहार में लाते हैं। और इसी कारण स्कूल, मित्र, पड़ौसी, सोशल मीडिया इत्यादि भी नैतिक मूल्यों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

संभवतः छोटी-छोटी सी बातें हमें बच्चों में नैतिक मूल्यों का बीज बोने में सहायक हो सकती हैं।

1- जो बोएंगे सो पाएंगें।
अपने बच्चों के सर्वांगीण नैतिक विकास के लिए हमें यथासंभव सर्वोपयुक्त वातावरण देने का प्रयास करना चाहिए। वे उस कोमल मिट्टी के समान होते हैं, जिसे जैसा वातावरण मिलता है, वे वैसे ही ढलते हैं।
इस तथ्य को डोरोथी लॉ नोल्टे ने बहुत ही सुंदर तरीके से अपनी लोकप्रिय कविता- ‘चिल्ड्रन लर्न वॉट दे लिव’ में व्यक्त किया है-
-जो बच्चा आलोचना के साथ रहता है, वह सदैव निंदा करना सीखता है।
-जो बच्चा शत्रुता के साथ रहता है, वह लड़ना सीखता है।
-जो बच्चा हमेशा भय के साये में रहता है, वह डरपोक बनता है।
-जो बच्चा सदा दूसरों पर आश्रित रहता है, वह हमेशा आत्मग्लानि में जीता है।
-जो बच्चा सदा उपहास का शिकार होता है, वह अकेलेपन में रहना पसंद करता है।
-जो बच्चा ईर्ष्यापूर्ण वातावरण में रहता है, वह स्वयं ईर्षालु बनता है।
-जिस बच्चे की हर बात पर गलतियां निकाली जाती है, वह सदा दोषी अनुभव करता है।
-जिस बच्चे को उचित प्रोत्साहन मिलता है, वह आत्मविश्वासी बनता है।
-जो बच्चा सहनशील वातावरण में पनपता है, वह धैर्यवान बनता है।
-जिस बच्चे को उपयुक्त प्रशंसा मिलती है, वह स्वयं दूसरों की सराहना करना सीखता है।
-जो बच्चा सद्भावपूर्ण वातावरण रहता है, वह दूसरों को प्यार करना सीखता है।
-जिस बच्चे को परिजनों से सराहना प्राप्त होती है, उसमें आत्म-सम्मान विकसित होता है।
-जिस बच्चे को सम्मान मिलता है, वह जीवन में लक्ष्य रखना सीखता है।
-जो बच्चा समन्वय में रहता है, वह उदारता सीखता है।
-जो बच्चा ईमानदारी और निष्पक्षता के साथ रहता है, वह सत्य और न्याय सीखता है।
-जो बच्चा सुरक्षित वातावरण में रहता है, वह स्वयं पर और दूसरों पर विश्वास करना सीखता है।
-जो बच्चा सौहार्दपूर्ण वातावरण में रहता है, वह इस दुनिया को जीने के लिए बेहतर स्थान मानता है।
-यदि आप शांतिमय जीवन जीते हैं, तो आपके शिशु का मन और व्यवहार भी शांतचित्त होगा।

क्यों ना हम यह विचार करें कि हम अपने बच्चों को कैसे ढालने का प्रयास कर रहे हैं?

2- सेतु संवाद का – ‘करनी कथनी से अधिक प्रभावी होती है।’ ।
माता-पिता यदि अपने बच्चों के साथ समरसतापूर्ण संवाद का सेतु स्थापित कर लें, तो वे उनके जीवन में नैतिक मूल्यों का बीज सरलता से रोपित कर सकते हैं। संवाद की अलोखिक मशाल सुगमता से उनमें ज्ञान की अलख प्रज्वलित कर सकती है।
तानाशाह बन अपने बच्चों को सदा निर्देश ना दें। भयमुक्त वातावरण में उनसे बातें करें। मुख्य विषयों पर चर्चा कर उन्हें स्वयं निर्णय लेने के लिए प्रोत्साहित करें। सही-गलत, उचित-अनुचित निर्णय लेने के लिए बौद्धिक क्षमता का विकास करने का प्रयास करें। और यह तभी होगा जब हम उनसे जीवन के अनेक पहलुओं पर अपनी निषपक्ष राय व्यक्त करने और तथ्यपूर्ण निर्णय लेने के लिए प्रेरित करेंगें।
हमें सदा उनसे आत्मीयरुप से कनेक्ट करने का प्रयास करना चाहिए। जब भी बात करें तो आँखों में आँखें डाल कर बात करें। उनकी बातें निर्विघ्न ध्यानपूर्वक सुनें। संवाद करते समय मोबाईल, लैपटॉप, टेलिविज़न इत्यादि के अनावश्यक उपयोग से बचें। इससे हमारे बच्चों को प्यार, अपनेपन, सम्मान और उचित महत्व मिलने का अहसास होगा और वे भी हमारी बातों का अनुसरण करेंगें।
‘करनी कथनी से अधिक प्रभावी होती है।’ वे हमको सुनकर नहीं, देखकर सीखेंगें।

3- दादी माँ की कहानियां।
युगों से ही दादी और नानी माँ की कहानियाँ बच्चों में नैतिक मूल्य विकसित करने का रोचक और सफल तरीका रहीं हैं। इससे माता-पिता और बच्चों के मध्य परस्पर प्यार भी बढ़ता है और उनमें पाठन के प्रति रुचि भी विकसित होती है।

4- व्यक्ति अपनी संगत से जाना जाता है – अपने बच्चे की सच्चे दोस्त चुनने में मदद करें।
सच्चे मित्र हमारे जीवन की नींव रखते हैं। वे वह मशाल होतें है जो अंधेरे में हमें जीवन की सही राह दिखाते हैं। अपने बच्चे को जीवन में अच्छे मूल्यों से सुसज्जित मित्रों का चुनाव करना सिखाएं।

5- परिश्रम के बिना कुछ नहीं मिलता!
हमें अपने बच्चों को जीवन में ईमानदारी और परिश्रम से जीना सिखाना चाहिए। उन्हें जिम्मेदारियों लेने और उसे पूर्ण करने के लिए प्रेरित करें। अनैतिक जुगाड़ या चुनौतियों से भाग कर सफल होने के आसान और मौकापरस्त तरीकों के प्रति हतोत्साहित करें। उन्हें यह बोध रहे कि सोना तप कर ही निखरता है।
मोहवश उनकी हर अनुचित मांग को बिना सोचे समझे पूरा ना करें। अन्यथा वे कभी भी उनकी उत्कृष्ट परवरिश हेतु हमारे द्वारा किये गए अनंत प्रयासों और सही गई अनगिनत वेदनाओं का सम्मान करना नहीं सीखेंगें।

6- दैनिक पुरस्कार प्रणाली – नैतिक मूल्यों और बैंकिंग ज्ञान को प्रोत्साहित करने का एक अभिनव तरीका।
बच्चों के लिए एक ‘रिवार्ड पॉइंट डायरी’ बनायें।
हर अच्छे और सराहनीय कार्य जैसे बुजुर्गों की सेवा, घरेलु कार्यों में सहायता, होमवर्क समय पर करना, भाई-बहनों की सहायता इत्यादि के लिए उन्हें सकारात्मक क्रेडिट प्वाइंट से पुरस्कृत करें। वहीं बुरी शरारतों या सामाजिक रूप से अस्वीकार्य व्यवहार करने पर अंक घटायें। नियमित दैनिक, साप्ताहिक और मासिक अंतराल पर संचित अंकों की गणना करने से बच्चों को अधिकाधिक अंक अर्जित करने का प्रोत्साहन मिलता है।
परिश्रम और सत्कार्यों द्वारा अर्जित इन अंकों से उसे उपहार खरीदने, दोस्तों के साथ पार्टी या अन्य उचित मांगों को पूर्ण करने की स्वतंत्रता दें।
अगर लगे कि बच्चे की माँग जायज है किंतु उसके पास पर्याप्त अंकों की कमी है तो हम उसे अतिरिक्त अंक उधार दे सकते हैं जिन्हें उसे निश्चित् समय में अच्छे कर्मों द्वारा हमें वापस चुकाना होगा।
इस डायरी के माध्यम से हम अपने बच्चों को अनेक बातें सीखा सकते हैं, जैसें-
-अपने सपनों को साकार करने के लिए पर्याप्त मेहनत करना।
-भविष्य के संकट या अनिश्चित् आवश्यकताओं का पूर्ती हेतु अर्जित अंकों का सहेज कर रखना।
-अपने संसाधनों को मितव्ययी हो उपभोग करना।
-बैंकिंग प्रणाली, बैंलेंस शीट प्रबंधन, क्रेडिट, डेबिट, लाभ, हानि इत्यादि का ज्ञान।
-पूरी ना हो सकने वाली मांगों के कारण माता-पिता से नाराज ना होना। क्योंकि उन्हें यह बोध होगा कि अगर उन्होनें अगर सकारात्मक अंक अर्जित किए होते तो हम जरुर उनकी मांगों को पूरा करते।

7- संतुलन, सुखद जीवन की कुंजी है!
जीवन-यापन और सफलता की अंधाधुंध दौड़ और परिवार की उचित-अनुचित आकांशाओं को पूरा करने के दबाव में हम अक्सर अपने बच्चों की भावनात्मक आवश्यकताओं को नजरअंदाज कर देते हैं।
जिन बच्चों को घर-परिवार में समोचित प्यार, मान-सम्मान और देखरेख नहीं मिलती वे निराशा, अवसाद और हीन भावना का शिकार हो जाते हैं। दूसरों का ध्यान आकर्षित करने के च्येष्टा में धीरे-धीरे वे एक प्रकार के मानसिक विकार- अटेंशन डेफिसिट हॉयपरकायनेटिक डिस्आर्डर से ग्रसित हो जाते हैं। इन बच्चों का व्यवहार अस्थिर, गुस्सैल, चिड़चिड़ा और उदासीन होता है। उत्तेजना में ये या तो स्वयं या किसी और को भी नुकसान पहुँचा सकते हैं।
बच्चों को उत्कृष्ट परवरिश देने हेतु माता-पिता के लिए अति-महत्वपूर्ण है कि वे अपने व्यवसायिक और पारिवारिक जीवन में उचित संतुलन बनाएं। इससे बच्चे भी जीवन में रिश्तों की अहमियत समझेंगें।

8- अपनी गलतियों के लिए क्षमा मांगें।
अपनी गलतियों के लिए माफी मांगने में हमें कतई संकोच नहीं होना चाहिए। अगर हमारे बच्चें हमारे कार्य या अधिकार पर सवाल करते हैं तो क्रोधवश हमें अनुपयुक्त प्रतिक्रिया देने से बचना चाहिए। इससे उन्हें यह अहसास होगा कि हम उनके विचारों और भावनाओं की कद्र करते हैं। साथ ही उन्हें भी अपनी गलती के प्रति जिम्मेदारीभरा व्यवहार करने की सीख मिलेगी।
हमारे व्यवहार से उन्हें यह बोध रहे कि राग-द्वेष छोड़ दूसरों को क्षमा करना ही मानवता हैं।

9- दुनिया में कितना गम है, मेरा गम कितना कम है।
अनाथाश्रम वह मंदिर है, जहाँ जाकर हमें यह अहसास होता है कि हम कितने खुशकिस्मत है कि ईश्वर ने हमें परिवार से नवाज़ा है।
जन्मदिवस या अवकाश के अवसर पर अपने बच्चे को अनाथाश्रम, अस्पताल या बस्ती अवश्य ले जांए। वहाँ अनाथ, सामाजिक रुप से वंचित या विकलांग बच्चों के साथ कुछ समय व्यतीत करने से उसे अपने भाग्यशाली होने का अहसास होगा।
इससे उसे ईश्वर के प्रति आराधना और प्राप्त हर सुख-सुविधा और अवसर के प्रति सम्मान पैदा होगा।

10- जिस-जिससे पथ पर स्नेह मिला, हर उस राही को धन्यवाद!
हम अपने बच्चों में दूसरों के प्रति कृतज्ञता का भाव अवश्य विकसित करें। उन्हें यह बोध होना चाहिए कि जिन सुख-सुविधाओं और अवसरों का वे आनंद उठा रहा है, उसके पीछे अनेकों लोग जैसे परिजन, शिक्षक, मित्र, सहायक, समाजजन इत्यादि का समर्थन, आशिर्वाद और कृपा शामिल है।

11- लाल मतलब रुको, हरा हो तो बढ़ो !
हम अपने बच्चों को यह सिखाना ना भूले कि यदि वे कभी भी क्रोध, ईर्ष्या या स्वार्थ से लाल हो रहें हो तो उन्हें कोई भी महत्वपूर्ण कार्य या निर्णय नहीं करना। क्रोध इंसान को जला कर नष्ट कर देता है।

12- हम वही बनते हैं, जो हम सोचते हैं।
यह संसार ज्ञान का पुंज है। जीव, अजीव, प्रकृति, घटना सब कुछ हमें कुछ ना कुछ सिखाते हैं। जीवन की छोटी-छोटी घटनायें बड़ी-बड़ी सीख दे जाती हैं। बस आवश्यकता है तो ज्ञान अर्जित करने के नजरिये कीअपने बच्चे के बौद्धिक विकास के लिए उसमें सीखने की अलख जगाएं। विभिन्न अच्छी या बुरी घटनाओं और परिस्थितियों पर विचार करने के लिए प्रेरित करें। हमारे विचार ही हमारे जीवन के सूत्रधार हैं।

13- टेलीविज़न और इंटरनेट के उपयोग पर निगरानी रखें।
हम अपने बच्चों को दुनिया से अलग एकांत में नहीं रख सकते। देश-दुनिया और सामयिक घटनाओं के बारे में जानना उनका अधिकार भी है और जागरुक करना हमारी जवाबदारी भी। टेलिविज़न और इंटरनेट ज्ञान के महत्वपूर्ण साधन हैं, किंतु उनका उचित उपयोग सुनिश्चित करना भी अतिआवश्यक है।
इनके उपयोग के लिए समयसारणी निर्धारित करें। टीवी और कंप्यूटर को घर में ऐसी जगह पर रखें जहां हर कोई आसपास हो ताकि वे कभी भी पर्यवेक्षण के बिना उपयोग न करें।

याद रखें, बच्चे के रुप में उस नन्हें ईश्वर ने इस संसार में अवतरित होने और अपनी देखभाल करने के लिए माता-पिता के रूप में हमको चुना है। यह हमारी नैतिक जिम्मेदारी है कि उत्कृष्ट परवरिश के माध्यम से हमारा बच्चा मानव जाति और समाज के लिए वरदान साबित हो ना कि एक बोझ।
आइये अपने बच्चे को सर्वश्रेष्ठ और अनमोल तोहफा दें- सामाजिक और नैतिक मूल्य।

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