प्रथम तिमाही में गुणसूत्र संबंधित विकार हेतु स्क्रीनिंग टेस्ट।(First Trimester Screening Tests)

प्रथम तिमाही में गुणसूत्र संबंधित विकार हेतु स्क्रीनिंग टेस्ट।(First Trimester Screening Tests)

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जीवित जन्में शिशुओं में लगभग 0.5-1 प्रतिशत शिशुओं में गुणसूत्र संबंधित विकार पाये जाते हैं। जिनमें अधिकांशतः डाऊन सिंड्रोम (21वे क्रोमोसोम की अतिरिक्ता) जो कि सर्वाधिक है के अलावा पटाऊ सिंड्रोम (13वे क्रोमोसोम की अतिरिक्ता), एडवर्ड सिंड्रोम (18वे क्रोमोसोम की अतिरिक्ता) और टर्नर सिंड्रोम (45X0 – X क्रोमोसोम की अल्प संख्या) से ग्रसित होते हैं।

इनमें से अधिकांश वंशानुगत या संरचनात्मक विकारों को गर्भावधी में प्रथम तिमाही के समापन तक न्यूकल ट्राँस्ल्यूसेंसी सोनोग्रॉफी और माता के रक्त में डबल मार्कर टेस्ट के माध्यम से सफलतापूर्वक पहचाना जा सकता है। इन्हें साथ में कंबाईन्ड टेस्ट के नाम से जाना जाता है। ये दोनों ही जांचें में पूर्णतः सुरक्षित और अतिआवश्यक हैं और इनसे माँ एवं शिशु को किसी भी प्रकार की हानि नहीं होती।

न्यूकल ट्राँस्ल्यूसेंसी स्केन-

इस विशिष्ट सोनोग्रॉफी को गर्भावधी के 11-13+6 के मध्य किया जाता है। यह अतिआवश्यक है कि यह सोनोग्रॉफी विशिष्ट प्रशिक्षण प्राप्त अनुभवी चिकित्सक द्वारा ही करवाई जाये जिससे चूक की संभावना नगण्य हो सके।

इसका मुख्य मकसद-

  • भ्रूण की संख्या, आकार और कुशलक्षेम जानना।
  • संभावित प्रसव की दिनांक का आंकलन करना
  • शिशु में क्रोमोसोम और संरचनात्मक विकार संबंधित निम्नलिखित गणकों का पहचान करना होता है।

1- न्यूकल ट्राँस्ल्यूसेंसी

शिशु की गर्दन की पिछली त्वचा की परत के मध्य में तरल पदार्थयुक्त रिक्त स्थान होता है जिसे न्यूकल फोल्ड कहते हैं। इसकी मोटाई सामान्यतः 3 मि.मी. से कम होती है।

किंतु गुणसूत्र संबंधित विकार जैसे डाउन सिंड्रोम या संरचनात्मक विकार जैसे जन्मजात हृदयरोग, डायग्फ्रेमेटिक हर्निया (छाती और पेट के मध्य स्थित डायाफ्रम झिल्ली का विकार जिसमें अमाशय का उच्च भाग असमान्यरुप से छाती में स्थित होता हैं) या एक्झेमफेलॉस (पेट के अग्रभाग का विकार जिसमें पेट के अंग असमान्यरुप से गर्भनाल में स्थित होते हैं) इत्यादि में न्यूकल ट्राँस्ल्यूसेंसी बढ़ जाती है।

न्यूकल फोल्ड की मोटाई को सोनोग्रॉफी की सहायता से मापा जा सकता है।

2- नसिका अस्थि (नेसल बोन) –

गुणसूत्र संबंधी विकारों विशेषकर डाऊन सिंड्रोम से ग्रसित लगभग 70 प्रतिशत शिशुओं में नाक की अस्थी या तो अनुपस्थित या अविकसित होती है। हालांकि 1% सामान्य शिशुओं में भी ऐसा हो सकता है।

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3- डक्टस विनोसस रक्तवाहिनी में प्रवाह स्तर

  • यह तुरही वाद्ययंत्र नुमा छोटीसी रक्तवाहिनी गर्भनाल की अंब्लीकल वेन के माध्यम से माता से प्राप्त आक्सीज़नयुक्त शुद्ध रक्त के अधिकांश खण्ड को इंफिरियर विनाकावा नामक मुख्य वाहिनी की ओर परिवर्तित करती है ताकि विशुद्ध रक्त शिशु के अन्य अंगों तक शीघ्रतम सुगमता से पहुँच सके।
  • गुणसूत्र संबंधित विकार, हृदय संबंधित रोग एवं दुष्क्रियता (हार्ट फेल्यर), प्रतिरोधकात्मक या गैर-प्रतिरोधकात्मक कारणों से शिशु के शरीर में सूजन (इम्यूनोलॉजिकल या नान-इम्यूनोलॉजिकल फीटल हाइड्राप्स) या शिशु का आसन्न निधन की संभावना की अवस्था में डक्टस विनोसस रक्तवाहिनी में रक्त का प्रवाह सर्वप्रथम अनुपस्थित तदुपरांत विपरीत दिशा में हो जाता है।

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4- हृदय के दाहिने खण्ड स्थित ट्रायकस्पिड वाल्व-

यह त्रिपत्ती वाल्व हृदय के दाहिने खण्ड में दायें एट्रिया और वेंट्रिकल के मध्य स्थित होता है। हृदयचक्र की शिथिल अवस्था के दौरान यह रक्त को एट्रियल चेंबर से वेंट्रिकल चेंबर में तो प्रवाहित होने देता है किंतु संकुचन अवस्था के दौरान उसे एट्रियल चेंबर में वापस जाने से रोक फेफड़ों की धमनी में प्रवाहित होने में सहायक होता है।

गुणसूत्र संबंधित विकार, हृदय संबंधित संरचनात्मक विकार, असामान्य हृदयताल, हार्ट फेल इत्यादि घातक दोषों में ट्रॉयकस्पिड वाल्व की दुष्क्रियता के कारण रक्त विपरीत दिशा में प्रवाहित हो सकता है। हालांकि 1-2 प्रतिशत सामान्य शिशुओं में बड़े दिल के आकार के कारण भी उत्परिवर्तन देखा जा सकता है।

5– अन्य संरचनात्मक विकृतियाँ जैसे न्यूरल ट्यूब डिफेक्ट इत्यादि भी पहचानी जा सकती हैं।

डबल मार्कर टेस्ट-

शिशु एवं आंवल द्वारा निर्मित अंतःस्त्राव (हार्मोन) की माता के रक्त में उपस्थित मात्रा की सहायता से अनेक गुणसूत्र संबंधित विकारों का अनुमान लगाया जा सकता है।

प्रथम तिमाही के समापन पर 11 से 13+6 सप्ताह की गर्भावधी के दौरान डबल मार्कर टेस्ट करवाना सुझावपूर्ण है।

इसमें-

  • पी.ए.पी.पी.-ए (PAPP-A; Pregnancy associated Plasma Protein-A)
  • ह्यूमन कोरियोनिक गोनेडोट्रॉपिन हार्मोन (HCG).

माता के रक्त में इन दोनों ही हार्मोन की मात्रा को उसकी उम्र, देश, जाति, जीवनशैली, धूम्रपान इत्यादि प्रभावकारी तत्वों के आधार पर मल्टीपल्स ऑफ मीडियन (MOM) नामक ईकाई और फलस्वरुप गुणसूत्र क्रमांक 21,13 और 18 संबंधित विकार की संभावना को निम्न, मध्यम और अधिक जोखिम के रुप में अभिव्यक्त किया जाता है।

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शिशु में गुणसूत्र संबंधित विकार की मध्यम और अधिक संभावना होने की दशा में माता को प्रमाण हेतु अग्रिम जाँच की पेशकश की जाती है। इसमें कोरियोनिक विलस सेंपलिंग द्वारा आंवल या एम्नियोसेंटेसिस द्वारा ऐम्नियोटिक द्रव्य से प्राप्त शिशु की कोशिकाओं की केरयोटाईप (गुणसूत्र की विशिष्टता जानने हेतु जांच) का अवलोकन किया जाता है। ये दोनों ही प्रक्रिया इंवेसिव होने के कारण इनमें 1-2 प्रतिशत गर्भवती महिलाओं में गर्भपात का भय होता है।

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हाल के वर्षों में गैर-इनवेसिव प्रीनेटल डायग्नॉस्टिक टेस्ट (Non-invasive Prenatal Diagnostic tests – NIPDT) की सहायता से माता के रक्त से ही शिशु की कोशिकारहित डी.एन.ए (Cell free DNA) प्राप्त कर विकारों की पुष्टी की जा सकती है। यह प्रक्रिया समानांतर संवेदनशील होने के साथ ही अधिक सुरक्षित भी होती है। अतः उपरोक्त दोनों प्रक्रिया के विपरीत इसमें गर्भपात होने का खतरा नगण्य होता है। किंतु इसकी एकमात्र सीमा इसकी अधिक कीमत है।

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स्क्रीनिंग टेस्ट की सीमाएं:

  • इनके माध्यम से लगभग 85 प्रतिशत डाउन सिंड्रोम से ग्रसित शिशुओं की ही संभावना जानी जा सकती है। 15 प्रतिशत ग्रसित शिशु चूक सकते हैं।
  • लगभग 5 प्रतिशत स्त्रियों में गलत परिणाम आ सकते हैं। अर्थात, शिशु में वास्तव में डाउन सिंड्रोम नहीं होने के बावज़ूद परीक्षा का परिणाम विकार की ओर संकेत करता है।
  • कम जोखिम वाले परिणाम यह सुनिश्चत नहीं कर सकते कि शिशु पूर्णतः सामान्य होगा और ना ही अधिक संभावना आने पर सदैव विकृत शिशु ही जन्मेगा।

स्क्रीनिंग टेस्ट से गुजरने से पहले जाने:

  • गर्भावस्था के दौरान स्क्रीनिंग टेस्ट (फर्स्ट ट्रॉयमेस्टर न्यूकल ट्रांसल्यूसेंसी स्केन और डबल मार्कर टेस्ट) हालांकि वैकल्पिक हैं। किंतु, शिशु में गुणसूत्र संबंधित विकारों के निदान हेतु ये परिक्षण करवाने सुझावपूर्ण होते हैं।
  • इनसे गर्भपात या गर्भावस्था संबंधी जटिलताओं का कोई खतरा नहीं है।
  • जांचे करवाने से पूर्व आपस में और अपने चिकित्सक से सभी पहलुओं और परिणाम पश्चात् प्रबंधन पर अवश्य चर्चा करें।
  • अपने जीवनसाथी और डॉक्टर से विस्तृत चर्चा अवश्य करें कि-
  • अनुकूल या प्रतिकूल परिणाम आने पर आपके लिए क्या मतलब होंगे?
  • यह आपकी गर्भावस्था के प्रबंधन को कैसे प्रभावित करेगा?
  • तद्पश्चात् परिणाम सुनिश्चित करने के लिए कौन से अतिरिक्त परिक्षणों की आवश्यकता होगी और उनके संभवतः क्या जोखिम हो सकते हैं?

संभवतः विस्तृत चर्चा के पश्चात् कुछ दंपति निजी, नैतिक या धार्मिक कारणों से स्क्रीनिंग या अतिरिक्त परीक्षण ना करवाने का भी निर्णय लेते है चाहे शिशु में विकृति की असीम संभावना ही क्यों ना हो।

सूचनाः

उक्त जानकारियाँ गर्भावस्था और शिशुपालन संबंधित विषयों पर सामाजिक जागरुकता पैदा करने हेतु साझा की गई हैं, ताकि, उनकी सुरक्षा सुनिश्चित कर माँ एवं शिशु मृत्यु दर कम की जा सके। लेखक द्वारा सर्वश्रेष्ठ प्रयास किया गया है, कि दर्शाई गई जानकारियाँ प्रामाणिक स्त्रोत्र से सही प्राप्त की गई हों। हालांकि उन के पालन से पहले अपने स्वास्थ अधिकारी से अवश्य चर्चा करें। 



 

First Trimester Screening Tests:

The incidence of chromosomal abnormalities in live babies is approximately 0.5-1%. Down syndrome (Trisomy21) is the most common chromosomal disorder among live births. The others are Patau’s syndrome (Trisomy13), Edward’s syndrome (Trisomy18) and Turner’s syndrome (Monosomy45X0).

Most of these Chromosomal abnormalities and structural defects can be identified with variable accuracy at the end of first trimester with the help of Ultrasonography and Double marker tests from the mother’s blood. They are together called as ‘Combined Tests’. They are routine prenatal screening tests and poses no risk of miscarriage or other pregnancy complications.

First Trimester Scan popularly called as NT Scan-

It is recommended between 11-13+6 weeks of Gestational Age. It is prudent to get this test done by well trained and experienced maternal fetal medicine specialists to avoid false results.

Its main objectives are

  • To measure the number of fetus and their size.
  • To calculate the expected date of delivery.
  • To detect abnormalities markers like –
  • Nuchal Thickness.

1- Nuchal Fold Transluscency Thickness.

Nuchal fold is the normal fluid filled clear space in the skin tissue at the back of the baby’s neck.

Its thickness>3 mm may indicate high risk of Chromosomal abnormalities especially Down’s syndrome, Congenital heart disease or other structural abnormalities like diaphragmatic hernia or exomphalos etc.

2- Nasal bone.

Around 70% of fetuses with the chromosomal abnormalities especially Down’s syndrome have absent or underdeveloped nasal bone against only about 1% of normal fetuses.

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3- Ductus Venosus.

It is a slender trumpet like blood vessel that shunts the blood from the portion of umbilical vein in the liver to the inferior Venacava just before it enters the heart. This is to ensure that predominant portion of well oxygenated blood received from placenta reaches the fetal heart and from there to rest of the body.

Absence or reversal of blood flow in ductus venosus may indicate chromosomal abnormalities associated with major cardiac defects, fetal heart failure, immune or non immune fetal hydrops, academia or increased risk of fetal demise.

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4- Tricuspid Valve.

It is a tri-leaf valve on Right side of Heart between Right Atria and Right Ventricle. It permits one way blood flow from Atria to Ventricle during Ventricular relaxation but prevents back flow when the Ventricles contract favoring forward flow to lungs through Pulmonary artery.

The malfunction of tricuspid valve may result into backflow of blood into Right Atria. This may be associated with Chromosomal abnormalities with major heart defects, abnormal heart rhythm, Heart failure etc.

The isolated Tricuspid regurgitation in absence of other defects can be due to large heart size in 1-2% of normal babies.

5- Other miscellaneous abnormalities like neural tube defects etc can also be diagnosed.

Double Marker Test-

The levels of fetus & placenta related hormones in mother’s blood may help to screen chromosomal abnormalities in baby.

The Double marker tests include measurement of

  • Pregnancy associated Plasma Protein-A (PAPP-A) and
  • Human Chorionic Gonadotropin (HCG) hormones.

The level of these two hormones are adjusted according to various parameters like age of the mother, ethnicity, life style, smoking etc and expressed in Multiples of Median (MOM). The final risk assessment is given as low, moderate or high risk probability against age-adjusted risk for Trisomy 21, 13 and 18.

First Trimester Screening-English

In case of moderate to high risk, the patients are offered invasive definitive tests like chorionic villous sampling, amniocentesis or percutaneous fetal blood sampling, through which fetal cells are retrieved from chorionic tissue, amniotic fluid or fetal blood respectively and karyotyped for confirmation of chromosomal aneuploidies.

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Recently a Non-invasive Prenatal Diagnostic tests (NIPDT) has been in clinical use that segregates cell-free fetal DNA from the mother’s blood for karyotype. It has a high specificity for chromosomal abnormalities and no risk for miscarriage as against invasive tests. But, it is very costly.

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Limitations of Screening Tests:

  • First trimester screening correctly identifies about 85 percent of women who are carrying a baby with Down syndrome.
  • About 5 percent of women have a false-positive result, meaning that the test result is positive but the baby doesn’t actually have Down syndrome.
  • A low-risk result doesn’t guarantee that your baby won’t have one of these conditions. Likewise, a high-risk result doesn’t guarantee that your baby will be born with one of these conditions.

Things to know before undergoing Screening tests:

  • The screening tests are routine prenatal tests and pose no risk of miscarriage or pregnancy complications.
  • They are optional but it is advisable to undergo to rule out chromosomal aneuploidies in baby.
  • Discuss with your spouse and Doctor about what the results will mean to you? Whether the screening will be worth any anxiety it might cause in your case? How will it influence the management of your Pregnancy? What level of risk would be enough for you to choose a more invasive follow-up test?
  • Some couple may elect not to pursue screening or additional tests due to
  • They are comfortable with the results no matter what the outcome
  • Because of personal, moral, or religious reasons, making a decision about carrying the child to term is not an option
  • Some parents choose not to allow any testing that poses any risk of harming the developing baby

It is important to discuss the risks and benefits of testing thoroughly with your healthcare provider. Your health care provider or a genetic counselor will help you understand your test results and what the results mean for your pregnancy.

Disclaimer:

The information is shared to create awareness towards Pregnancy and Childcare to reduce maternal and child deaths. At most care has been taken by the author to include the verified information from authentic sources. However, kindly discuss the same with your health care provider before implementation.