मानव प्रसव सहायक आधारित क्यों ? (Why do Human Beings need assistance for Delivery?)

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कई बार यह विचार अंतर्मन को विचलित करता है कि जो गर्भावस्था जीव-जंतुओं में बिना किसी सहायता के सामान्य प्रक्रिया है, वही मनुष्यों में इतनी कष्टदायक व सहायक आधारित क्यों ?

क्या जंगल में शेरनी या हथिनी के प्रसव के लिए चिकित्सकीय सुविधा उपलब्ध होती है या कोई दाई या सहायक उनकी मदद के लिए उपस्थित होता है ? फिर क्यों हम इतनी प्रगति या उपलब्धियों के बाद भी जच्चा-बच्चा की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर पाते ?

प्रसव जंतुओं में हो या मानव में, गर्भावस्था व प्रसव के अपने निहित खतरे होते हैं। प्रत्येक प्रसव माँ व नौनिहाल दोनों के लिए असुरक्षित व प्राणघातक हो सकता है।

मानव प्रसव क्रिया, अन्य जीवों से भिन्न कैसे है?

क्रमिक विकास के दौरान हमारे चौपाया (Quadrupedal) प्राणी से द्विपाद (Bipedal) प्राणी बनने की प्रक्रिया में शरीर का पूरा भार दो पैरों पर आने से, श्रोणी चक्र (Pelvic Girdle) की संरचना में परिवर्तन हुआ।

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इसके साथ ही, अधिक उपयोग व क्षमता बढ़ने के कारण मस्तिष्क का आकार भी पूर्ववर्ती जीवों की तुलना में विशाल व समृद्ध होता गया।

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जिससे प्रसवक्रिया के दौरान पश्चक्पाल (Occiput) व पीठ माँ की ओर होती है। किंतु, अन्य जीव अपनी माॅ को चेहरा दिखा कर (Face to Pubes) पैदा होते है।

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ऐसे में जहां अन्य जीवों में माँ प्रसव के दौरान बाहर आने में अपने नौनिहाल की मदद कर सकती है, किंतु मानवों में महिला ऐसा नहीं कर पाती।

साहित्यिक रूप से देखें तो मनुष्य एकमात्र ऐसा प्राणी है, जो पैदायशी मतलबी होता है तथा अपनी माँ को पीठ दिखाकर ही पैदा होता है।

इन दोनों कारणों से, श्रोणी-चक्र की भिन्न संरचना एवं विशाल मस्तिष्क होने से मानव प्रसव सहायक आधारित व दुविधाजनक है।

मानव प्रसव क्रिया के दुष्प्रभावः
दोपाया होने के कारण मानवों में श्रोणीतल (Pelvic Diaphragm) की निम्न मांसपेशियों के मध्य योनी व मल द्वार के लिए जो रिक्त स्थान है, उस पर गुरूत्वाकर्षण का दबाव पड़ता है। प्रसव के दौरान शिशु के मस्तिष्क द्वारा नीचे योनी की नसों पर भार पड़ने से नीचे की मांसपेशियाँ कमजोर पड़ जाती हैं।

अगर प्रसवोपरांत नियमित व्यायाम द्वारा उन्हें पुनः मजबूत ना किया जाए तो अनेक महिलाओं में जननांग नीचे की ओर लटक जाते हैं और हँसने – खांसने के दौरान मूत्र विसर्जन की समस्या से महिलाऐं ग्रसित हो जाती हैं। अतः प्रसवोपरांत नियमित व्यायाम आवश्यक है।

सूचनाः

उक्त जानकारियाँ गर्भावस्था और शिशुपालन संबंधित विषयों पर सामाजिक जागरुकता पैदा करने हेतु साझा की गई हैं, ताकि, उनकी सुरक्षा सुनिश्चित कर माँ एवं शिशु मृत्यु दर कम की जा सके। लेखक द्वारा सर्वश्रेष्ठ प्रयास किया गया है, कि दर्शाई गई जानकारियाँ प्रामाणिक स्त्रोत्र से सही प्राप्त की गई हों। हालांकि उन के पालन से पहले अपने स्वास्थ अधिकारी से अवश्य चर्चा करें। 



Why do human beings need assistance for their delivery?

Pregnancy is a miracle. It is a process by which mammals reproduce themselves and continue their progeny. At the completion of maturation, the fetus in utero delivers out and come into worldly existence.

Often, you might have asked to yourself or your Gynecologist, that an animal in jungle delivers unassisted but, why do human being needs assistance for their delivery?
What happened in the due course of evolution that our ancestor monkey could control their delivery, but we became dependent on medical assistance? Why are we not able to ensure the safety of mother and child in spite of all the medical advances and use of resources?

The process of birthing has its own inherent dangers, may it be animals or human. Every pregnancy and childbirth carries fatal risk to both mother and child and hence should be treated with utmost care.

Let us first understand, how the process of birthing differs in human being and other animals.

During evolution, the human being have transformed from a quadrupedal animal (who walk on four legs) into a bipedal animal (who walk on two legs). With this change in posture, the complete body weight was borne by the pelvis resulting in adaptation in its size and shape.

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In addition, with evolutionary development of fine skills, the size of brain is increasing progressively.

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As a result the preferred position of delivery during the process of birthing is occipito-anterior position (i.e. baby’s back towards mother’s abdomen and front towards mother’s spine), whereas in other animals, the fetus delivers facing the mother. So, the parturient mother in animals can help her baby during the process of childbirth, whereas in human they cannot.

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Philosophically, the human beings are so mean that they deliver by facing back to their mother.

For these two reasons, changes in pelvis and increased brain size, the human beings have difficult and assistance dependent birthing process!

The perineum (soft tissue base of pelvis) has slit like structural defect to facilitate the process of birthing and defecation. As a result of bipedal posture, the gravitational pressure of abdominal organs is transferred to the weak perineum. In case of prolonged or difficult vaginal delivery or stress of chronic constipation/ cough the integrity of perineal muscles can give way, resulting in pelvic organs prolapse or stress incontinence. So, postpartum pelvic exercises are recommended.

Disclaimer:

The information is shared to create awareness towards Pregnancy and Childcare to reduce maternal and child deaths. Atmost care has been taken by the author to include the verified information from authentic sources. However, kindly discuss the same with your health care provider before implementation.