वर्तमान परिदृश्य में एक पिता की कहानी उसकी जुबानी।

वर्तमान परिदृश्य में एक पिता की कहानी उसकी जुबानी।

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उसने मांगा साथ बस मेरा, मैं हाथ झटक कर चला गया।
जिंदगी की रेलमपेल में अपनी, जग उसका बेरंग कर गया।।
उसने बेवक्त वक्त क्या मांगा, मैं बहानों की झड़ी लगाता गया।
चंद लम्हें प्यार के देने की जगह, अनचाहे तोहफों की बिसात बिछाता गया।।

था हक उसका जब-जब रूठने का मुझसे,
मनाने की जगह उसे अहसानों की याद दिला दी।
जाने अनजाने साम-दाम-दंड-भेद,
ना जाने कितनी ही सिला दी।

कांप रहा था जीवन में परिक्षा के डर से थर-थर जब वो-
हिम्मत देने की जगह मैं दे रहा था ज्ञान,
इतने अंक आने पर ही मिलेगा घर में मान और सम्मान।।

रिश्तों को अनजाने ही व्यापार के तराजू पर तोल दिया।
ना चाहते हुए भी ना जाने कितने अपशब्द बोल दिया।।
उसने जब जो चाहा उसे कुछ ना दे पाया।
उलट दे बहाना वास्तविकता का,
उससे ख्वाहिशों का हक भी छीन लिया।।

आज समय की बेदी पर, बुढापा ओढ़ पड़ा हूँ।
वक्त की कचहरी में मजबूर सा खड़ा हूँ।।
दे रहा हूँ हिसाब अपने कर्मों का सब।
अपने ही खोदे गढ्ढे में गढ़ा हूँ।।

आज मेरी औलाद के पास हर चीज़ है मुझे देने के लिए।
बस वह वक्त नहीं, जो मैं भी कभी दे ना पाया।
और सच ही तो है- वह फल मिलेगा कैसे,
जिसका बीज ही मैं बो ना पाया।।

काश मैं वक्त की घड़ी पलट पाता।
एक पिता के रूप में तुम्हारा बचपना पुनः जी पाता।
सच मानों हर घड़ी बस प्यार की झड़ी लगाता।
अमीर नहीं, दिल से धनी बाप बन दिखाता।।
काश मैं वक्त की घड़ी पलट पाता।।

रचनाकार- डॉ सचिन गोठी।
हेप्पी प्रेग्नेंसी ग्लोबल इनिशिएटिव।