स्त्री आभ्यन्तर जननांग। (Female Internal Genital Organs)

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आभ्यन्तर जननांगों में मुख्यतः योनी, गर्भाशय डिम्बवाहिनी तथा डिम्बग्रंथियाँ आती हैं।

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योनि (Vagina)-

गर्भाशयग्रीवा (Cervix) एवं योनिबहिर्मुख (Vulval Introitus) के मध्य स्थित लगभग 9 सें.मी. लंबी माँसपेशी युक्त नलिका को योनि कहा जाता है। स्त्री-पुरूष के समागम के दौरान संभोग में शिश्न योनि नलिका में ही प्रवेश करता है, व इसी के द्वारा मासिक स्त्राव व गर्भस्थ शिशु बाहर निकलता है।

पूर्व भाग मूत्र-प्रसेक (Urethra) तथा मूत्राशय के आधार (Base of Bladder) से एवं पश्चिम भाग मूलाधारगात्र (Perineal Body), मलाशय (Rectum) एवं योनि-गुदान्तरीय कोष्ठ (Pouch of Douglous) से संबंधित है। दोनों पार्शवों में पायुधारिणि (Levator Ani) नामक दो माँसपेशियाँ रहती हैं। गर्भाश्य ग्रीवा की उपस्थिति के कारण योनि का ऊपरी भाग को चार छत्रिकाओं (Fornices) में बांटा जाता है – अग्रिम (Anterior), पाश्चात्य (Posterior) तथा बायें एवं दायें पार्शव छत्रिकाऐं (Lateral Fornices)।

उपयोगिता-

  • ग्रीवा मुख योनि के पूर्व भाग में खुलता है, व उसके मुख की दिशा पीछे पाश्चात्य छत्रिका की ओर होती है। संभोग क्रिया में पुरूष अपने वीर्य का स्खलन पाश्चात्य छत्रिका में करते हैं। ऐसे में शुक्राणुओं के गर्भाश्य में प्रवेश में सरलता होती है।

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  • किसी रोग वश यदि पेट में रक्त या मवाद एकत्रित है, तो इसका परिक्षण पश्चिम छत्रिका के माध्यम से योनि-गुदान्तरीय कोष्ठ (Pouch of Douglous) में सुई द्वारा प्रवेश कर सरलता से किया जा सकता है।

संरचना-

योनि में भीतर से बाहर की ओर चार स्तर होते हैं-

  • श्लैष्मिककला स्तर (Mucous Membrane) यह रंजककण-विहीन, स्तरित पट्टकी उपकला (Non-Keratinised Stratified Squamous Membrane) है। इसकी कोष्ठकों में उपस्थित शर्करा को यहां उपस्थित डोडरलीन कीटाणु (Doderleins’ Bacilli) दुग्धाम्ल (Lactic Acid) में परिवर्तित कर देते हैं, जिसके कारण योनि की प्रतिक्रिया अम्लीय (Acidic pH = 4.5) रहती है। व वह इसे साधारण संक्रमणों से सुरक्षा प्रदान करती है।

इसमें अनेक अनुप्रस्थ रेखाऐं (Rugae) होती हैं, ताकि संभोग व प्रसव के दौरान यह आसानी से चौड़ी हो सके।

  • अधः श्लैष्मिक स्तर (Submucous Layer) यह रक्तधर संयोजक तन्तुओं (Vascular Connective Tissue) तथा शिथिल विरल अवकाशी तन्तुओं (Loose Areolar Tissue) से निर्मित होता है।
  • मांसपेशी स्तर (Muscular Layer) इसका अन्तर्भाग वृत्ताकार, कुण्डलिकाकार (Spirally arranged) एवं बाह्य भाग अनुदीर्घ अनैच्छिक रेखा विहीन (Unstripped Involuntary) पेशीतन्तुओं से निर्मित होता है। योनिद्वार के समीप योनिद्वारसंकोचनी तथा मूत्रद्वारसंकोचनी पेशीतंतु इस आवरण को और मजबूत बना देते हैं।
  • बाह्य सौत्रिक स्तर (Outer Fibrous Layer) यह सैत्रिक तन्तुओं से निर्मित अत्याधिक धमनियों तथा सिराजाल से युक्त स्तर है। यह योनि को मजबूत स्तर प्रदान करता है।

योनि का रक्त संवहन-

योनि को गर्भाशयिक धमनी (Uterine Artery) की योनिग्रैवीय शाखा (Cervico-Vaginal branch), योनि धमनी (Vaginal Artery), मध्य गुद (Middle Rectal Artery) तथा अंतः उपस्थ धमनी (Internal Pudendal Artery) के द्वारा रक्त मिलता है। सिराओं का जाल सा बनकर रक्त को अंतःश्रोणिफलक सिरा (Internal Iliac Vein) में पहुँचाता है।

योनि का उच्च कोटि रक्त संचार संभोग क्रिया के दौरान पर्याप्त हर्ष एवं स्त्राव उत्पन्न करने, व घर्षण या यौन संक्रमण की अवस्था में घाव को त्वरित ठीक करने में मदद करता है।

योनि का लसिका संवहन-

योनि से बाह्य श्रोणी ग्रंथियों (External Iliac Nodes), अंतः श्रोणीफलक ग्रंथियों (Internal Iliac Nodes) तथा वंक्षण ग्रंथियों (Inguinal) के माध्यम से अधिकांश लसिका का संवहन होता है।

योनि की नाडि़याँ-

त्रिक 2,3 एवं 4 के नाड़िजाल से बनी हुई उपस्थ नाड़ी ही मुख्य नाड़ी है, जो संज्ञा एवं क्रियावहन दोनों ही कार्य करती है।

गर्भाशय (Uterus)

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इस विशिष्ट अंग का मुख्य कार्य गर्भस्थ शिशु को अनुकूल स्थान प्रदान करना है।

गर्भावस्था में इसका निर्माण दक्षिण एवं वाम मूलेरियन नलिकाओं (Right And Left Mullerian Ducts) के एकल अवयव में समागम से होता है। यह त्रिकोणाकार व कुछ चपटा सा रहता है। यह सामने की ओर झुका हुआ – अग्रनत (Anteverted) और अग्रकुंचित (Anteflexed) रहता है। ताकि ग्रीवामुख पाश्चात्य छत्रिका के सम्मुख होने से शुक्राणुओं के प्रवेश में सरलता रहे।

बायें में सिग्माईड कोलोन (Sigmoid Colon) की उपस्थिति के कारण यह दाहिने ओर घुमा हुआ (Dextro Rotated) भी रहता है।

वर्णन हेतु गर्भाष्य को तीन भागों में विभाक्त किया जाता है।- गर्भाशय शारीर (Body), ग्रीवा (Cervix), गर्भाशय मुख (Os)।

गर्भाशय शारीर (Body of Uterus)

यह वह भाग है, जिसमें गर्भ का अवस्थान होता है। इसके उच्च स्थान में दो डिम्ब वाहिनियां खुलती हैं, जिनके माध्यम से गर्भाशय में प्रारंभिक भ्रूण का प्रवेश होता है।

समझने की दृष्टि से गर्भाशय शारीर को भी तीन भागों में वर्णित किया जाता है – 1- गर्भाषय बुध्न (Fundus of Uterus) यह डिम्बवाहिनियों (Fallopian Tubes) के निवेश स्थान के ऊपर स्थित भाग है। 2- गर्भाशय गात्र (Corpus of Uterus): मध्य भाग। 3- गर्भाशय संकीर्ण पथ (Isthmus): गर्भावस्था के अंतिम काल में यह विकसित होकर अधोगगर्भाशय खण्ड (Lower Uterine Segment) बनाता है। यह अंतर्मुख के माध्यम से ग्रीवा के ऊपरी भाग से मिलता है।

चूंकि, इस भाग की मांसपेशियों की मोटाई व संकुचन क्षमता कमतर होती है, अतः अगर कनेरी गर्भाशय के इस भाग या अंतर्मुख में, शिशु से निम्न स्तर पर विकसित होती है तो इसे प्लेसेंटा प्रीविया (Placenta Previa) कहते हैं। यह गर्भावस्था व प्रसूति को जटिल बना कर माँ व शिशु दोनों के लिए ही प्राणघातक होती है।

चूंकि, इस भाग की मांसपेशियाँ समान रूप से आड़ी स्थित होती हैं, सीजेरियन शल्यक्रिया के दौरान अधिकांशतः गर्भाशय पर आड़ा चीरा इसी स्थान पर लगाया जाता है, ताकि मांसपेशियों को बिना कांटें प्रथक कर शिशु को बाहर निकाला जा सके तथा अगली गर्भावस्था में टांके खुलने की संभावना कम हो सके।

गर्भाषय की भित्तियों में तीन स्तर पाये जाते हैं – बाह्य, मध्य और आंतरिक।

बाह्य स्तर: यह पर्युदर्या के सीरमी स्तर से बना होता है। इसे परिगर्भाशय (Perimetrium) कहते है।

मध्य स्तर: यह अपेक्षाकृत मोटा और अनैच्छिक मांसपेशियों से निर्मित होता है। इसे गर्भाशयपेशी स्तर      (Myometrium) कहते है। इसका मुख्य कार्य प्रसव के समय संकुचन के माध्यम से गर्भ को प्रजनन-नलिका के मार्ग से बाहर को प्रक्षेपित करना है।

आंतरिक स्तर: यह श्लैष्मा से आच्छादित होता है। इसे अंतर्गर्भाशयकला या श्लैष्मिककला (Endometrium) कहते हैं। इसका मुख्य कार्य प्रारंभिक भ्रूण को पोषण प्रदान करना व कनेरी निर्मित करने में सहयोग प्रदान करना है। स्त्री के पुनरोत्पादक वर्षों (Reproductive Age) में प्रत्येक माह (Menstrual Cycle) मासिक स्त्राव (Menstruation) के रूप में इसका वर्ण बदलता रहता है।

ग्रीवा (Cervix)

इसका कुछ भाग उल्टे गुंबद की तरह योनि के ऊपरी भाग में प्रक्षिप्त रहता है। प्रक्षिप्त भाग का ऊपरी मुंह जो गर्भाशय पिण्ड में खुलता है वह आंतरिक मुख तथा निचला हिस्सा जो योनि में खुलता है वह बाह्य मुख कहलाता है। आंतरिक व बाह्य मुख के बीच का भाग संकरा और तंग होता है।

गर्भाशय में रक्त संवहन (Vascular Supply)

गर्भाशय में रक्त की आपूर्ति आभ्यंतर श्रोणिफलकीय धमनी (Internal Iliac Artery) की गर्भाशयिक शाखा (Uterine Artery) और औदर्या महाधमनी (Abdominal Aorta) की डिंबग्रंथिय धमनी (Ovarian Artery) शाखा के माध्यम से होती है।

रक्त वापसी गर्भाशयिक सिरा (Uterine Vein), डिंबग्रंथिय सिरा (Ovarian Vein), पृथु स्नायु स्थित पैम्पिफिनी फॉर्म सिराजाल (Pampaniform plexus of veins), योनिनलिकीय सिराजाल (Vaginal Plexus) तथा मेरूदण्डीय सिराजाल (Vertebral Plexus) के माध्यम से होता है।

गर्भाशय का लसिका संवहन (Lymphatic Drainage)

गर्भाशयग्रीवा (Cervix) से लसिका पराग्रैवीय जाल (Paracervical Plexus) तथा बहिःश्रोणि (External Iliac), अधोदरीय (Hypogastric), गवाक्ष (Obturator) एवं त्रिक (Sacral) लसिका ग्रंथियों (Lymph nodes) के द्वारा तथा गर्भाशय के शेष भाग से उपर्युक्त ग्रंथियों के अतिरिक्त उपरिस्थ वंक्षण ग्रंथियों (Superficial Inguinal Nodes) में जाता है।

गर्भाशय की नाड़ियाँ-

गर्भाशय को स्वतंत्र नाड़ी संस्थान की अनुकम्पी (Sympathetic) एवं पराअनुकम्पी (Parasympathetic) दोनों प्रकार की नाड़ियाँ आती हैं। इसके अतिरिक्त रक्तवाहिनियों की नाड़ियाँ उनकी भित्ति में रहती हैं।

गर्भाशय के अवलम्ब (Supports of Uterus)

गर्भाशय जिन अंगों के सहयोग से अपने स्थान पर टिका रहता है, उन्हें गर्भाशय के अवलंब कहते हैं। इनमें से प्रमुख हैं –

  • श्रोणितल (Pelvic Floor)।
  • गर्भाशय ग्रीवा के अनुप्रस्थ स्नायु (Transverse Cervical Ligaments)।
  • गर्भाशयत्रिक स्नायु (Uterosacral Ligaments)।
  • जघन गर्भाशयग्रीवा स्नायु (Pubocervical Ligaments)।
  • गोल स्नायु (Round Ligaments)।

इन अवलंबों की शिथिलता से गर्भाशय, योनिमार्ग व उनके सहारे स्थित मूत्राशय व मलाशय अपना स्थान छोड़ योनिद्वार से बाहर की ओर लटकने लग जाते हैं। जिस कारण महिला को पेशाब छूटने की समस्या, योनक्रीड़ा में असुविधा व दर्द, ग्रीवा पर छाले या मल रोकने की समस्या इत्यादि से परेशानी होती है। उपयुक्त शल्यक्रिया के माध्यम से उन्हें पुनः यथास्थिति में लाया जाता है।

गर्भाशय के कार्य –

गर्भाशय मुख्य रूप से निम्न कार्यों का संपादन करता है।

  • संसेचित डिम्ब को ग्रहण करना, धारण करना तथा संपूर्ण गर्भावस्था में गर्भ को एक सुरक्षित स्थान प्रदान कर पोषण करना।
  • गर्भावस्था की समाप्ति पर प्रसव काल में पेशीय आकुंचनों की सहायता से गर्भ को बाहर निकालना।
  • गर्भ के अभाव में प्रति माह मासिक स्त्राव को बाहर निकालना।

डिम्ब वाहिनियाँ (Fallopian Tubes)

गर्भाशय के दोनों ऊध्र्व कोणों (Uterine Cornu) से निकल कर पीछे घूमती हुई ये नलिकायें लगभग 10 सें.मी. लंबी होती हैं। ये तान्तव-पेशी-श्लैष्मल तुंतओं (Fibro-Musculo-Mucosal) से निर्मित होती हैं। गर्भाशय श्रृंग से प्रारंभ हो, डिम्बग्रंथियों पर एक चाप (Arch) बनाती हुई ये श्रोणीगुहा में पीछे की ओर उनके निकट खुलती हैं। ये अपने पूरे मार्ग में गोल स्नायु (Round Ligaments) के ऊपर की ओर चलती हैं और ऊपरी तीन सतह पर्युदर्या (Peritoneum)से ढकी रहती हैं। परिपक्व डिम्ब (Mature Graffian Follicle) इन्हीं में आकर तथा संषेचित (Fertilisation) होकर गर्भाशय में पहुँचता है।

रचना (Structure)-

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मध्य में स्थित पेशीय भित्तिय (Muscular Layer) का बाहरी आवरण पर्युदर्या (Peritoneum) से ढका रहता है और अंतहावरण श्लैष्मिक झिल्ली (Mucous MEmbrane) से, जो रोमक उपकला (Ciliated Epithelium) से बनता है।

वर्णन की दृष्टि से डिम्बवाहिनियों को चार खण्डों में विभक्त किया जाता है।

  • अन्तरालीय भाग (Interstial) – लगभग 2 सें.मी. लंबा यह भाग गर्भाशय की चौड़ाई में ही समाविष्ट हो जाता है। इसकी अवकाशिका का व्यास (Intaluminal Diameter) मात्र 1 मि.मी. संकरा होता है। यह भाग ना तो पर्युदर्या स्तर से आच्छादित रहता है और ना ही इसमें अनुदैध्र्य पेशी तंतु (Contractile) होते हैं।
  • संकीर्ण भाग (Isthmic) – यह गर्भाशय कोण के बाहर लगभग 1 से.मी. लंबा सीधा भाग है। यह पर्युदर्या स्तर से ढका रहता है। इसकी भित्तियां अपेक्षाकृत मोटी होती हैं। अवकाषिका का व्यास 3 मि.मी. संकरा होता है।
  • कलशिका भाग या तुम्बिका खण्ड (Ampulla) – यह वाहिनी का लगभग 5 सें.मी. का सबसे लंबा और चौड़ा भाग है। झल्लरी खण्ड के निकट इसकी कला वृक्षवत् अनेक शाखाओं में विभक्त हो जाती है। वाहिनी के इसी खण्ड में गर्भाधान की क्रिया संपादित होती है। डिम्बाणु एवं शुक्राणु यहीं निषेचित होते हैं।
  • झल्लरी प्रांत भाग (Infundibulum) – वाहिनी का कीपाकार (Funnel shaped) यह खण्ड डिम्बग्रंथियों के निकट फैला हुआ होता है, जहाँ इसका अंतिम छोर झालरों के रूप में लटका रहता है। इन्हें डिम्ब झल्लरियाँ (Fimbriae) कहते हैं। इनमें से एक लंबी झल्लरी डिम्ब ग्रंथी को ढकती है, जिसके माध्यम से परिपक्व अण्डा वाहिनियों में प्रवेश करता है।

कार्य (Functions)

डिम्बवाहिनियों का काम डिम्बग्रंथियों से उत्सर्जित परिपक्व डिम्ब को ग्रहण करना और अपनी रोमक उपकला (Ciliated Columnar Epithilium)  की सहायता से उसे गर्भाशय तक पहुँचाना है।

डिम्ब ग्रंथियाँ (Ovaries)

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ये गर्भाशय के दोनों ओर डिम्बवाहिनियों के नीचे श्रोणीगुहा की पार्शव भित्तियों में स्थित होती हैं। ये बदामनुमा लगभग 5 * 2.5  * 1.5 से.मी. आकार और 5 – 10 ग्राम वजनी होती हैं। इनका बाहृ परत प्रायः झुर्रियों से युक्त होता है। ये गर्भाशय के पृथु स्नायु (Round Ligaments) के पार्शव भाग में पर्युदर्या की लपेट से (Utero-Ovarian Ligaments) जुड़ी रहती हैं।

रचना (Structure)

इसके दो मुख्य भाग होते हैं- प्रांतस्था (Cortex) और अंतःस्था (Medulla) । ये संयोजी ऊतकों की पीठिकाओं से युक्त बहुसंख्यक डिम्बों से बनी रहती है।

डिम्बग्रंथियों का बाहृ तल घनाकार जननिक उपकला (Germinal Epithilium) के एकल स्तर से ढका रहता है। इसके नीचे ग्रंथी के तान्तव संयोजी ऊतकों से निर्मित तान्तव कोष जो ग्रंथी को सुरक्षा प्रदान करता है स्थित होता है, जिसे डिम्बग्रंथी कञचुक (Tunica Albuginea) कहते हैं।

जन्म के समय डिम्बग्रंथियों में लगभग 4 मिलियन आद्य-पुटक (Premordial Follicles) होते हैं। इनका आकार 0.25 – 1 मि.मी. तक होता है। इनमें से प्रत्येक में एक डिम्बाणु-प्रसूजन या अण्ड (Oogonium) होता है, जो कणीय कोशिकाओं के स्तर से युक्त होता है। ये कोशिकायें एक विशेष प्रकार की पीठिका कोशिकायें (Stromal Cells) होती हैं, जो अंतःस्त्राव का निर्माण करती हैं।

वयःसंधि काल (Puberty) पश्चात् प्रत्येक मासिक चक्र के दौरान लगभग 1000 आद्य-पुटक (Premordial Follicles)  सक्रिय होते हैं, जिनमें से लगभग 20 पुटक चयनित (Recruit) होते है, जिनमें से सर्वश्रेष्ठ पुटक परिपक्व होकर डिम्ब-पुटक (Graffian Follicle) के रूप में विकसित होता है। इसका आकार लगभग 1 से.मी. होता है। डिम्ब क्षरण (Follicule Rupture) के माध्यम से यह विदरित (Ovulation) होकर श्रोणी गुहा में मुक्त होता है। जहाँ से यह डिम्बवाहिनियों में उत्पन्न आकर्षक दाब (Negative Vaccum Pressure)  के कारण वाहीनियों के भीतर प्रवेश करता है।

डिम्बक्षरण के कुछ ही क्षण पहले प्राथमिक डिम्बाणुजनकोशिका (Primary Ovarian Follicle) अध-सूत्रण (Meiosis) की प्रक्रिया पूर्ण कर अपने पहले ध्रुवीय पिण्ड (Primary Polar Body) का त्याग कर देती है। फलतः उसकी नाभी में 46 के स्थान पर 23 गुणसूत्र (क्रोमोसोम) ही रह जाते हैं।

निषेचन (Fertilisation) प्रक्रिया में 23 क्रोमोसोम युक्त डिम्ब व समान गुण युक्त शुक्राणु मिलकर 46 क्रोमोसोम (23 क्रोमोसोम के जोड़े) युक्त निषेचित डिम्ब (Secondary Ovarian Follicle)  बनाते हैं, जो शीघ्र द्वितीय ध्रुवीय पिण्ड (Second Polar Body) का भी त्याग कर युग्मनज (Zygote) का रूप धारण करती हैं।

डिम्ब-पुटक (Graffian Follicle) डिम्बक्षरण पश्चात् ल्यूटिनिकरण (Leutinisation) प्रक्रिया के माध्यम से पीत-पिण्ड (Corpus Luteum) में परिवर्तित हो जाती है, जो ईस्ट्रोजन एवं प्रोजेस्ट्रॉन नामक अंतःस्त्राव बनाते हैं।

निषेचन की अवस्था में प्रारंभिक भ्रूण स्वयं की सहायता हेतु विकासशील कनेरी के माध्यम से ह्युमन कोरियोनिक गोनेडोट्रॉपिन (Human Chorionic Gonadotropin) नामक अंतःस्त्राव बनाता हैं। यह हार्मोन पीत पिण्ड का विकास कर उसकी सक्रीयता लगभग 3 माह तक बनाए रखता है, जब तक भ्रूण ईस्ट्रोजन एवं प्रोजेस्ट्रॉन हार्मोन का निर्माण पूर्णतः स्वयं करने में सक्षम ना हो जाए।

निषेचन के अभाव में पीत पिण्ड 10 दिवस के भीतर पतन होकर श्वेत-पिण्ड (Corpus Albicans) का निर्माण करता है, जो ईस्ट्रोजन एवं प्रोजेस्ट्रॉन हार्मोन का निर्माण करने में अक्षम होते हैं, और जिसके अभाव में अंतर्गर्भाशयकला या श्लैष्मिककला (Endometrim) मासिक स्त्राव के रूप में निष्किासित हो जाती है।

कार्य –

डिम्ब ग्रंथियों के प्रमुखतः दो कार्य होते हैंः

  • डिम्बाणुओं का उत्पादन करना।
  • मुख्यतः दो प्रकार के अंतःस्त्राव ईस्ट्रोजन एवं प्रोजेस्ट्रॉन का निर्माण करना।

सूचनाः

उक्त जानकारियाँ गर्भावस्था और शिशुपालन संबंधित विषयों पर सामाजिक जागरुकता पैदा करने हेतु साझा की गई हैं, ताकि, उनकी सुरक्षा सुनिश्चित कर माँ एवं शिशु मृत्यु दर कम की जा सके। लेखक द्वारा सर्वश्रेष्ठ प्रयास किया गया है, कि दर्शाई गई जानकारियाँ प्रामाणिक स्त्रोत्र से सही प्राप्त की गई हों। हालांकि उन के पालन से पहले अपने स्वास्थ अधिकारी से अवश्य चर्चा करें। 




Female Internal Genital Organs

Female Internal genital organs mainly consist of Vagina, Uterus, Fallopian tubes and Ovaries.

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Vagina –

It is a 9 cm long elastic muscular canal that lies between Vulval Introitus and Cervix of the Uterus. It is through this that the menstrual blood exits out and during intercourse the male penetrates their penis into the female. During normal delivery, the baby comes out through this and hence it is also called as birthing canal.

Anteriorly it is bounded by Urethra and bladder base, posteriorly by Perineal body, Rectum and Pouch of Douglus and laterally by the two Levator Ani muscles. Due to protrusion of cervix, its upper part is divided into four fornices – Anterior, Posterior and two Lateral fornices.

Utility

External os of the cervix opens into the vagina facing the posterior wall. During the sexual intercourse, males ejaculate their semen into the posterior fornix. This relation of cervix and vagina facilitates the easy entry of sperms into the uterine cavity to aid pregnancy.

intercourse

The collection of blood or pus into the pelvic cavity can be easily diagnosed or drained through inserting a needle into the posterior fornix.

Structure

The wall of vagina consists of four layers.

1- Mucous Membrane – It is made up of Non-Keratinised Stratified Squamous Epithelial Cells. It inhabitates Doderlein’s Lactobacillus bacteria that converts sugar into Lactic acid resulting in acidic milieu (Acidic pH = 4.5). This acidic atmosphere provides protection against harmful infections. The rugousity of this layer allows the distension of vaginal canal during intercourse and childbirth.

2- Submucous Layer– It is made up of vascular connective tissue that helps in rich blood supply to vagina and loose areolar tissue that aids in its distensibility.

3- Muscular Layer– It contains spirally arranged inner and longitudinal outer layer composed of involuntary smooth muscles. At vulval opening, the contribution from urethral and perineal muscles make this layer more strong.

4- Outer Fibrous Layer– It is composed of strong fibrous connective tissue that provides strength to the vaginal canal.

Vaginal blood supply-

Vaginal gets its rich blood supply from Cervico-Vaginal branch of Uterine artery, Middle Rectal Artery and Internal Pudendal Artery. The venous blood drains into Internal iliac vein.

The rich blood supply to vaginal secretory glands results in enough lubrication during arousal to avoid friction and injury and aids in orgasmic pleasure. It also facilitates quick healing in case of infections.

Vaginal lymphatic supply

The lower third part of vagina drains mostly into Inguinal lymph nodes; whereas inner two-third into Internal and External Iliac lymph nodes,

Vaginal Nerve supply-

The nerve supply to the vagina is primarily from the autonomic nervous system from sacral nerve roots S-2,3 and 4.

Uterus-

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The most important function of this organ is to provide lodging to the growing fetus.

It is made up from the lateral fusion of Right and Left mullerian ducts. It is inverted pear shaped, triangular and a bit flattened. It rests forward on vagina and bladder resulting in Anterversion and Anteflexion respectively. This position facilitates easy entry of sperms from posterior fornix into uterine cavity.

Due to the presence of Sigmoid colon on its left, it is slightly dextro-rotated towards Right. Hence, there is little stretch on Left round ligament.

Anatomically it is divided into three parts – Body of Uterus, cervix and os.

1- Body of Uterus

The fetus resides into this part of Uterus. The fertilized egg enters into the uterine cavity through the fallopian tubes that open into its fundal cornu. It is described into three parts –

a. Fundus: It is the broad part of the uterus where the two fallopian tubes open at cornu.

b. Corpus: Middle part of the uterus.

c. Isthmus: The narrow part of the body that during pregnancy forms the lower uterine segments due to distension from growing fetus. It connects to the upper part of vagina through cervical canal.

If the placenta develops into the lower uterine segment, the condition is called as Placenta Previa. Since the muscle density and its contractile capacity is low in this part, there is a increased risk of life threatening excessive bleeding during or after delivery.

As the muscles are arranged almost horizontally into this part, it is the preferred site for the transverse muscle splitting incision on the uterus during caesarean delivery rather than muscle cutting incision on upper segment of uterus. This reduces the risk of scar rupture in subsequent pregnancies.

The wall of the uterus is made up of three layers.

  • Outer layer: It is made up of serous peritoneum and is also called as Perimetrium.
  • Middle Layer: This is formed from relatively thick and involuntary muscles. It is called as Myometrium. Its contractile force during delivery results in birth of the fetus through vagina.
  • Inner Layer: It is composed of glandular, highly vascular endometrial lining. Its main function is to provide nutrition to the early embryo till it forms placenta to derive nutrition from mother.

During reproductive age, if the female do not conceive, it sheds in the form of menstrual blood every menstrual cycle, so that new layer can form for fresh egg.

Cervix

The cervix is a cylinder-shaped lowest part of uterus that opens into the upper part of vagina. It is approximately 2-3 cm long. The inner opening is called as Internal os, whereas outer opening is called as External os.

It is composed of cartilaginous tissue lined with single layer of columnar cells.

The inner glands of cervical canal produce mucus that under the influence of hormones changes its consistency during menstrual cycle to prevent or promote pregnancy. It also prevents infection of lower genital tract to ascend and hence protects against pelvic inflammatory disease (PID).

During childbirth, the cervix dilates widely to allow the baby to pass through the passage. During menstruation, the cervix opens a small amount to permit passage of menstrual blood flow.

Uterine blood supply

Uterus derives its major blood supply from Uterine artery which is a branch of anterior division of Internal Iliac Artery. It also derives its blood supply from Ovarian artery which is a direct branch of Abdominal Aorta. The rich network is to ensure the adequate supply during pregnancy.

The venous blood returns through a network of Uterine vein, Ovarian vein, Pampaniform plexus, Vaginal plexus and Vertebral plexus of veins,

Uterine Lymph supply-

The lymphatics from cervix drain through Paracervial plexus into External Iliac, Hypogastric, Obturator and Sacral group of lymph nodes. The lymphatics from rest of the uterus drain in addition to these into Superficial Inguinal nodes also.

Uterine Nerve Supply

Uterus is independently supplied by both Sympathetic and Parasympathetic nerves.

Supports of Uterus

The uterus is supported by strong connective tissue network that helps it to remain in its location. Significant amongst them are:

  • Pelvic Floor. It supports from below. It predominantly consists of strong levator ani muscles with perineal membrane along with other connective tissues.
  • Transverse Cervical Ligaments. It forms the supportive rim around the upper vagina and cervix and forms a bridge between uterus and lateral pelvic wall.
  • Uterosacral Ligaments. It is the strongest support to the uterus that connects uterus to sacral vertebrae.
  • Pubocervical Ligaments. It connects uterus anteriorly to pubic bone.
  • Round Ligaments. They are considered as false support as they do not play significant role in supporting the uterus.

It is because of the stretching of Round ligaments that sometimes the mother feels pain in lower abdomen at sides while changing posture suddenly.

Dysfunction or weakness of these supports may displace the uterus, bladder and rectum resulting in their prolapse out of vagina leading to leakage of urine while cough or sneeze, difficulty in urination and defecation, discomfort in sexual intercourse, chronic pelvic pain, erosion on cervix, etc. Due to this, the females may require corrective surgeries.

The functions of the uterus-

  • Provides home to developing embryo and nurture it till the baby is mature enough for birth.
  • Contract at the completion of gestational period to deliver the baby.
  • Regenerate its inner lining every month in the form of menses to ensure that new endometrial lining is available for the developing egg.
  • Provides structural integrity and support to the bladder, bowel, pelvic bones and organs.

Fallopian Tubes-

They are approximately 10 cm long two fine tubes that start from uterine horn, arch over the ovaries and open near them. They are made up of Fibro-muscular cylindrical tube that is covered outside by the peritoneum and the lumen is lined inside with ciliated epithelium.

The negative suction pressure is created within the canal lumen due to the tubal peristalsis and the inward movements of the ciliary epithelium. The mature egg that is released free into the peritoneal cavity during ovulation is picked up by the tubes and carried towards the uterus. The fertilization of the egg takes place at the ampullary part of the tube and then the zygote is carried towards the endometrial cavity for the implantation and further development.

Structure

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The fallopian tube is divided into four parts.

  • Interstitial part – This 2 cm long part is incorporated in the width of the uterine musculature. The intra-luminal diameter is 1 mm narrow. This part is not covered with peritoneum and it lacks contractile tissue.
  • Isthmic part – This 1 cm long part starts from the uterine angle and is covered with the peritoneal lining. Its wall is relatively thick and intra-luminal diameter is 3 mm narrow.
  • Ampullary part – This 5 cm part is longest and widest segment of the tube. The epithelium is designed into complex mucosal folds that increase the surface area and the probability of egg-sperm contact. Hence the egg is fertilized in ampullary part of the tube.
  • Infundibulum part – This funnel shaped part has finger-like projections that surround the ovary like a claw and picks the released mature egg.

Functions –

The fallopian tube picks the released mature egg from the peritoneal cavity through negative suction, helps it get fertilized and then transport the zygote to endometrial cavity for the implantation and further development with the help of tubal peristalsis and ciliated columnar epithelium.

Ovaries-

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They are almond shaped egg producing organ found in pair and located at the posterior aspect of the uterus. They are approximately 5 * 2.5 * 1.5 cm in size and weigh 5-10 grams. The outer surface is corrugated to provide larger surface area to the egg producing germinal epithelium. It is attached laterally to pelvic bones through infundibulo-pelvic ligaments and medially to uterus through utero-ovarian ligaments.

Structure

It has two main parts: the Cortex and the Medulla. The outer surface of the ovary is covered with single layer of egg producing germinal epithelium. Its inner layer is covered with a strong layer of thick connective tissue called Tunica Albuginea that provides protection to the ovary.

The eggs are formed in fetal life in yolk sac and remain dormant till puberty. At birth, the ovaries contain approximately 4 million immature Premordial Follicles. Their size range from 0.25 to 1 mm. Each primordial follicle contains an egg in its core surrounded by layers of stromal cells. The stromal cells produce hormones.

At puberty the menstrual cycle begins and every month approximately 1000 primordial follicles begin to develop out of which 20 are recruited for further development. The best amongst them takes the lead and mature into Graffian follicle of about 1 cm size. At middle of the cycle the mature follicle ruptures to release the egg free into the peritoneal cavity. This process is called as ovulation. This free egg along with its surrounding stromal cells is picked up by the fallopian tubes through the negative suction pressure.

After ovulation the released egg undergoes the process of sexual/reduction division called Meiosis and forms Primary ovarian follicle and primary polar body which contains 23 chromosomes each instead of 46.

During fertilization, the haploid eggs and sperms containing 23 chromosomes each meet to form a single fertilized egg called zygote with diploid chromosomes (46 chromosomes). It under go Mitotic / equal division to release a second polar body. This zygote undergoes repeated process of cellular growth, division to form the bunch of cells that undergo differentiation to form an embryo with specialized organs.

The remnant of ovarian Graffian follicle undergoes process of leutinization to form the corpus luteum that produces estrogen and progesterone to support pregnancy. Whereas in absence of fertilisation and implantation, it degenerates in 10 days to formnon-functional Corpus Albicans. In absence of progesterone, the inner endometrial lining of uterus sheds in the form of menses.

The embryo helps own survival by producing Human Chorionic Gonadotropin, that prolongs the life of corpus luteum by 3 months so that it can produce required hormones to support pregnancy till the placenta is formed and takes over.

Functions of Ovaries:

1- To produce egg.

2- To produce and release Estrogen, Progesterone, Inhibin and other hormones.

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