एम्नियोटिक द्रव्य की अलप्ता। (Oligohydramnios)

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गर्भावस्था के दौरान लगभग 5-10 प्रतिशत माताएं एम्नियोटिक द्रव्य की अल्पता से ग्रसित होती हैं। यह ना केवल माता एवं शिशु में विकार का द्योतक हो सकता है, किंतु इसके कारण शिशु के विकास में भी अवरोध आ सकता है।

भ्रूणावरण द्रव्य या गर्भोदक क्या है?

सगर्भा गर्भाशय में एमनियोटिक थैली (भ्रूणावरण झिल्ली) में निहित विशिष्ट द्रव्य जो गर्भावस्था के दौरान भ्रूण को बाहरी क्षति एवं दबाव से सुरक्षा प्रदान करता है और समोचित विकास एवं हलचल के लिए योग्य वातावरण प्रदान करता है, उसे भ्रूणावरण द्रव्य, एमनियोटिक फ्लूईड या गर्भोदक कहते हैं।

प्रथम तिमाही में, इसका निर्माण स्थैतिक बल (Hydrostatic Pressure) और ऑस्मोटिक बल (Osmotic Pressure) के प्रभाव में मातृ प्लाज्मा से विसरण (Diffusion) के माध्यम से होता है। किंतु द्वितीय तिमाही के पश्चात जब भ्रूण के गुर्दे सक्रीय हो जाते हैं, तो इसका मुख्य स्त्रोत्र भ्रूण की मूत्र होता है।

एमनियोटिक द्रव्य की पर्याप्त मात्रा एवं शुद्धता सुनिश्चित करने के लिए शिशु एवं थैली के मध्य इसका नियमित परिसंचरण होता रहता है। 24 सप्ताह की सगर्भता से पूर्व भ्रूण इसका त्वचा के माध्यम से और तद्पश्चात त्वचा का किरातिनिकरण (keratinization) होने के बाद इसे आँतों के माध्यम से मुख्यतः अवशोषित करता है।

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एमनियोटिक द्रव्य का अंतर्वस्तु?

पहली तिमाही में एमनियोटिक द्रव मुख्य रूप से खनिज पदार्थ एवं पानी से निर्मित होता है। किंतु 12-14 सप्ताह के बाद भ्रूण के विकास के लिए सभी आवश्यक तत्व जैसे प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा, फॉस्फोलिपिड और अपशिष्ट यूरिया इत्यादि भी मौजूद रहते हैं।

एमनियोटिक द्रव्य की मात्रा?

प्रारंभिक काल में गर्भकाल व भ्रूण के विकास के साथ एमनियोटिक द्रव्य की मात्रा निरंतर बढ़ती है।  28 सप्ताह के गर्भकाल पर लगभग 1-1.2 लीटर की पठार तक पहुँचकर फिर उसमें समय के साथ गिरावट आती है। जन्म के समय यह 800-1000 मिलीलीटर तक होती है और तद्पश्चात यह तेजी से कम होती चली जाती है।

एम्नियोटिक द्रव्य का महत्व?

    • शिशु के चारों ओर कोमल वातावरण प्रदान कर यह विकासशील भ्रूण को बाहरी झटकों और क्षति से बचाता है।
    • यह भ्रूण को हलचल के लिए पर्याप्त जगह प्रदान करता है ताकि माँसपेशियों और कंकाल का समोचित विकास हो सके।
    • एमनियोटिक द्रव्य का भ्रूण द्वारा निगलकर आँतों के माध्यम से अवशोषण आँतो और पाचनतंत्र के विकास में योगदान देता है। इसके माध्यम से जातविष्ठा (meconium) का निर्माण होता है।
    • गर्भाशय के आंतरिक दाब को कम कर यह भ्रूण के फेफड़ों के समोचित विकास की अनुमति देता है।
    • एमनियोटिक द्रव्य में भ्रूण की कोशिकाऐं उपस्थित होती है, जिन्हें विशिष्ट परिस्थितियों में ऐम्नियोसेंटेसिस (Amniocentesis) नामक प्रक्रिया के माध्यम से प्राप्त कर आनुवंशिक रोगों का निदान किया जाता है।
    • इसमें उपस्थित लेसिथिन-स्फिंगोमायलिन (Lecithin-Sphingomyelin) नामक रसायनिक तत्वों के अनुपात की माप द्वारा भ्रूण के फेफड़ों की परिपक्वता का आकलन करने में मदद मिलती है।

एम्नियोटिक द्रव्य की अलप्ता क्या है?

गर्भावस्था में भ्रूण के चारों ओर स्थित एमनियोटिक द्रव्य की अलप्ता शिशु के विकास में अवरोध संबंधित एक चिंताजनक अवस्था है। परिभाषा के हिसाब से जब एमनियोटिक द्रव्य सूचकांक 5 से कम है या एकल सबसे बड़े जेब की ऊंचाई 1 सेमी से कम हो तो एम्नियोटिक द्रव्य की अलप्ता मानी जाती है।

एमनियोटिक द्रव्य की अलप्ता के लक्षण

  • रोगी कम भ्रूण हलचल महसूस होने की शिकायत कर सकते हैं।
  • सगर्भताकाल के सापेक्ष में पेट की परिधि का कम ज्ञात होना।
  • केवल भ्रूण मात्र का अहसास होना और भ्रूण अंगों का प्रखर प्रतीत होना।
  • गर्भोदक थैली फटने की स्थिति में योनि से अत्यधिक, अनैच्छिक, अनियंत्रित तरल स्राव होना।

एम्नियोटिक द्रव्य की अलप्ता के कारण क्या होते हैं?

एम्नियोटिक द्रव्य की अलप्ता के बहुआयामी कारक होते हैं।

मातृ कारक:

  • गर्भावस्था प्रेरित उच्च रक्तचाप, दीर्घकालीन गंभीर रोग, ऐंटीफोस्फोलिपिड ऐंटीबॉडी सिंड्रोम, विषाणु संक्रमण इत्यादि एमनियोटिक द्रव्य की अलप्ता के मुख्य कारण होते हैं।
  • माँ द्वारा विशिष्ट दवाईयों का सेवन जिनसे शिशु को प्राप्त होने वाला रक्त प्रभावित हो सकता है, जैसे दर्द निवारक या रक्तचाप संबंधित दवाईयाँ।
  • माता में कम जल ग्रहण करने या उल्टी-दस्त के कारण मातृ निर्जलीकरण।
  • आंतरिक जननांग संक्रमण या आघात के कारण गर्भोदक थैली फटने से एमनियोटिक द्रव का रिसाव।

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भ्रूण कारक:

  • भ्रूण में अनुवाँशिक गुणसूत्र संबंधित विसंगतियाँ।
  • भ्रूण और गर्भाशय के संक्रमण।
  • भ्रूण में गुर्दे या मूत्र मार्ग का विकसित ना होना या मूत्र मार्ग में वाल्व के रूप में अवरोध होना।
  • लघुतर व कम वजन का शिशु। (IUGR)।
  • परिपक्वता उपरांत।
  • जुड़वा गर्भाधान की परिस्थिति में दोनों के मध्य असमान्य रक्त संचार के कारण ट्विन-ट्विन ट्राँसफ्यूशन सिंड्रोम।

अपरा कारक:

मातृ-अपरा-भ्रूण संयंत्र की दुष्क्रियता के कारण शिशु को रक्त प्रवाह की कमी के परिणामस्वरूप भ्रूण द्वारा कम मूत्र का उत्पादन एमनियोटिक द्रव्य की अलप्ता का एक प्रमुख कारण है।

यह विकार मुख्यतः गर्भावस्था प्रेरित उच्च रक्तचाप, दीर्घकालीन गंभीर रोग, ऐंटीफोस्फोलिपिड ऐंटीबॉडी सिंड्रोम, विषाणु संक्रमण इत्यादि के कारण अपरा की धमनियों में विकार के कारण होता है।

भ्रूणावरण की कोशिकाओं द्वारा स्राव की विफलता (एमनियोटिक नोडोसम) भी अल्पता का कारण हो सकता है।

अधिकांशतः सही कारण की पहचान करना मुश्किल होता है।

एम्नियोटिक द्रव्य की अलप्ता का निदान कैसे किया जाता है?

शारिरिक ​​परीक्षण:

  • गर्भाशय का आकार गर्भावस्था की अवधि की तुलना में काफी छोटा होता है।
  • भ्रूण की कम हलचल।
  • एमनियोटिक द्रव्य की अलप्ता के कारण गर्भाशय “भ्रूण से भरा” प्रतीत होना।
  • भ्रूण का लघुतर विकास।

अल्ट्रासोनोग्राफी:

  • परिभाषा के हिसाब से जब एमनियोटिक द्रव्य सूचकांक 5 से कम है या एकल सबसे बड़े जेब की ऊंचाई कम से कम 1 सेमी हो तो एमनियोटिक द्रव्य की अलप्ता मानी जाती है। सभी चार भागों में गर्भनाल से रहित जेब की खड़ी ऊंचाई के योग से एमनियोटिक द्रव्य सूचकांक मापा जाता है।
  • भ्रूण मूत्राशय की सामान्य भरने और खाली की प्रक्रिया से मूत्र मार्ग के विकार पकड़े जा सकते हैं।
  • गुणसूत्र संबंधित विकार से ग्रसित भ्रूण सममित विकास मंदता (Symmetrical intrauterine growth retardation) के साथ एम्नियोटिक द्रव्य की अलप्ता से पीड़ित होते हैं।

एम्नियोटिक द्रव्य की अलप्ता के दुष्प्रभाव

एम्नियोटिक द्रव्य की अलप्ता के कारण संभावित जटिलतायेः-

  1. गर्भनाल पर दबाव के कारण शिशु की मृत्यु का भय।
  2. एम्नियोटिक द्रव्य की अलप्ता के कारण गर्भाशय के दबाव के परिणामस्वरूप चेहरे, हड्डियों, माँसपेशियों का विरूपण जैसे clubfoot, contractures आदि  मस्कुलोस्कैलेटल असामान्यताएं।
  3. फेफड़ो के अवरुद्ध विकास के परिणामस्वरूप शिशु को अतिदक्षता विभाग की आवश्यकता।
  4. जन्म के समय शिशु का कम वजन।
  5. पॉटर सिंड्रोम जिसमें मुख्यतः एम्नियोटिक द्रव्य की अलप्ता, फेफड़ो के अवरुद्ध विकास, अंग एवं  मुखाकृति के विकार इत्यादि शामिल है। भ्रूण के द्विपक्षीय गुर्दों के अविकसित होने के कारण भ्रूण द्वारा मूत्र निर्माण में कमी इसका सबसे अहम कारण है।

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एम्नियोटिक द्रव्य की अलप्ता का उपचार-

  • भ्रूणावरण झिल्ली के फटने और एम्नियोटिक द्रव्य के सक्रीय रिसाव की स्थिति में बिस्तर पर संपूर्ण विश्राम अनिवार्य है।
  • मौखिक सेवन या नसों में तरल पदार्थ के माध्यम से माता में पर्याप्त पानी की मात्रा बनाए रखना चाहिए।
  • समोचित पौष्टिक आहार का सेवन।
  • चिकित्सीय सलाह पर उचित मात्रा में ईकोस्प्रिन नामक दवाई का सेवन आँवल के माध्यम से शिशु को रक्त संचार में वृद्धि करती है।
  • लिवो-आरजेनाईन नामक दवाई नाइट्रिक ऑक्साइड नामक रसायनिक तत्व का उत्पादन कर रक्त धमनी का व्यास बढ़ाकर शिशु के रक्त संचार बढ़ाने में सहायक सिद्ध हो सकती है, इस विषय पर अनुसंधान जारी है।
  • यौन संक्रमण संबंधित एम्नियोटिक द्रव्य के स्त्राव की स्थिति में एंटीबायोटिक दवाईयों का सेवन आवश्यक होता है।
  • अनुमानित समयपूर्व प्रसव या लघुतर शिशु के जन्म की अवस्था में माँ को कॉर्टिकोस्टीरॉईड के इंजेक्शन देने से भ्रूण के फेफड़ों की परिपक्वता में सहायता मिलती है और शिशु को NICU और Ventilator की आवश्यकता कम पड़ती है। यौन संक्रमण की अवस्था में इन्हें एंटीबायोटिक दवाईयों के संग दिया जाना चाहिए।

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  • गर्भनाल पर दबाव को रोकने के लिए प्रसव के दौरान एम्नियोटिक द्रव्य की मात्रा बढ़ाने के लिए एम्नियो इंफ्यूशन की प्रक्रीया के माध्यम से तरल पदार्थ को भ्रूणावरण की झिल्ली में प्रविष्ट किया जाता है। यह केवल अतिदक्ष केन्द्रों पर विशेषज्ञों द्वारा ही किया जाना चाहिए।
  • जन्मजात मूत्रमार्ग की रुकावट की अवस्था उचित शल्यक्रिया आवश्यक एवं सहायक होती है।

सूचनाः

उक्त जानकारियाँ गर्भावस्था और शिशुपालन संबंधित विषयों पर सामाजिक जागरुकता पैदा करने हेतु साझा की गई हैं, ताकि, उनकी सुरक्षा सुनिश्चित कर माँ एवं शिशु मृत्यु दर कम की जा सके। लेखक द्वारा सर्वश्रेष्ठ प्रयास किया गया है, कि दर्शाई गई जानकारियाँ प्रामाणिक स्त्रोत्र से सही प्राप्त की गई हों। हालांकि उन के पालन से पहले अपने स्वास्थ अधिकारी से अवश्य चर्चा करें। 



What is amniotic fluid?

The amniotic fluid is the protective liquid contained by the amniotic sac with in the gravid uterus which surrounds and protects the fetus.

In the first trimester, it is produced from maternal plasma through osmosis and hydrostatic pressure. However from second trimester onwards, when fetal kidneys begin to function, its major share is produced from fetal urine.

The amniotic fluid is re-circulated among fetus and sac to ensure filteration and maintain adequate quantity. Before 24th week of gestation, the fluid is re-absorbed through the fetal skin. But, after that since keratinization of fetal skin occurs, the fluid is primarily absorbed by the fetal gut.

Contents of Amniotic Fluid?

In first trimester the amniotic fluid mainly is mainly composed of water with electrolytes. After the 12-14th weeks it also contains proteins, carbohydrates, lipids and phospholipids and urea, all of which aid in the growth of the fetus.

Appropirate Volume of Amniotic Fluid?

The volume of amniotic fluid increases with the growth of fetus, reaches a plateau of approximately 1-1.2 liters by the 28 week gestational age and then declines thereafter. At birth it ranges from 800-1000 ml.  After 40 weeks of gestational age it reduces significantly.

Importance of Amniotic Fluid:

Ø Amniotic fluid protects the developing baby by cushioning against blows to the mother’s abdomen.

Ø It allows easier fetal movement & promotes muscular/skeletal development.

Ø Amniotic fluid swallowed by the fetus helps in the formation of the gastrointestinal tract and contributes to the formation of meconium.

Ø It allows lung development by avoiding the uterine pressure off them.

Ø Biochemical analysis of amniotic fluid, drawn out of the mother’s abdomen through amniocentesis procedure, can reveal many aspects of the baby’s genetic health as it is also contains fetal cells.

Ø It can help to assess fetal lung maturity in case preterm delivery is indicated by measurement of lecithin- sphingomyelin ratio.

What is oligohydramnios?

Oligohydramnios is a condition in pregnancy characterized by a deficiency of amniotic fluid in the amniotic sac.

What are the clinical features of oligohydramnios?

The patient may complain of reduced fetal movements, reduced abdominal girth and full of fetus sensation and undue prominence of fetal parts.

In case of water break she may complain of involuntary loss of fluid from her vagina or excessive vaginal discharge.

What are the causes of oligohydramnios?

The causes of oligohydramnios may be multifactorial.

Maternal Factors:

  • Pregnancy Induced Hypertension, Chronic illness, Antiphospholipid antibody syndrome, Viral infections etc leading to Maternal fetal insufficiency.
  • Maternal intake of drugs such as Prostaglandin inhibitors that are used as pain killers or ACE inhibitors that are used to control high blood pressure.
  • Premature rupture of membranes leading to leakage of amniotic fluid, most commonly due to lower genital tract infections or trauma.
  • Maternal dehydration.

Fetal Factors:

  • Fetal chromosomal anomalies
  • Intra uterine infections
  • Renal agenesis or obstruction of the urinary tract of the fetus preventing micturition such as posterior urethral valves in males
  • Intrauterine growth retardation(IUGR).
  • Twin- twin transfusion syndrome in case of multiple gestation.

Placental Factors:

  • Reduced blood supply to fetus due to Maternal-Placental-Fetal blood insufficiency leading to decreased fetal urine formation resulting in oligohydramnios.
  • The most common reason for it are pregnancy induced hypertension, hypercoagulability, antiphospholipid antibody syndrome etc.
  • Failure of secretion by the cells of the amnion covering the placenta (Amnion nodosum)

Most of the times it is difficult to identify the exact cause.

How it oligohydramnios diagnosed?

Clinical Examination:

  • Uterine size is much smaller than the period of amenorrhoea.
  • Less fetal movements,
  • The uterus “full of fetus” because of scanty liquid,
  • Evidences of IUGR of the fetus.

Ultrasonography:

  • The diagnosis of oligohydramnios is made when the Amniotic fluid index is less than 5 or the height of single most largest pocket is less than 1 cm . AFI is measured by summation of vertical height of fluid pockets devoid of umbilical cord in all the four quadrants.
  • Visualization of normal filling and emptying of fetal bladder essentially rule out urinary tract abnormality,
  • Oligohydramnios with fetal symmetric growth retardation is associated with increased chromosomal abnormality.

Complications of Oligohydramnios-

Complications may include

  1. Cord compression,
  2. Musculoskeletal abnormalities such as facial distortion and clubfoot, contractures etc.
  3. Decreased Fetal Lung growth and maturity leading to breathing difficulties.
  4. Intrauterine growth retardation.
  5. Potter’s syndrome is a condition caused by oligohydramnios. Affected fetuses develop pulmonary hypoplasia, limb deformities, and characteristic facies. Bilateral agenesis of the fetal kidneys is the most common cause due to the lack of fetal urine.

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Treatment of Oligohydramnios-

  • Bed rest in case of Premature rupture of membranes and active leakage.
  • Adequate maternal hydration with oral intake or intravenous fluids.
  • Good nutritious diet.
  • Low dose ecospirin may be prescribed to increase the uteroplacental circulation.
  • Role of nitric oxide donor like arginine and other vessel dilating agents is under research.
  • Antibiotics in case of associated genital infections.
  • Steroids to aid fetal lung maturity in case of early delivery is anticipated. In case of infections, it should be given under cover of antibiotics.

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  • Amnio-infusion during labor to prevent umblical cord compression. It should only be performed in centres specialising in invasive fetal medicine and in the context of a multidisciplinary team. There is uncertainty about the procedure’s safety and efficacy
  • In case of congenital lower urinary tract obstruction, fetal surgery is recommended.

Disclaimer:

The information is shared to create awareness towards Pregnancy and Childcare to reduce maternal and child deaths. Atmost care has been taken by the author to include the verified information from authentic sources. However, kindly discuss the same with your health care provider before implementation.