I hope you understand Papa!

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“आई होप यू अंडरस्टेंड पापा!” सैंकड़ों परिवारों की दुर्दशा व्यक्त करता यह वाक्य जैसे बार-बार काँनों में गूंज कर मन व्याकुल कर रहा है।

फिल्म ‘102 नॉट-आऊट’ में महानायक अमिताभ बच्चन जी और ऋषि कपूरजी के मध्य फिल्मांकित वह दृश्य जिसमें अमितजी अपने पोते की चिट्ठियाँ पढ़ते हुए बार-बार इस वाक्य को बोल रहे थे, तो अश्रुओं को बहने से ना रोक सका। इस संशय में कि कहीं मेरे साथ भी यही हृदय विदारक अनहोनी ना हो और उस कुविचार कि मेरे जान से प्यारे बच्चे मुझे कभी छोड़ तो नहीं देंगें, ने मन में उथल-पुथल मचा रखी थी।

एक पल खुद को ही ढाँढस बँधाया कि, मैं मेरे बच्चों को ऐसे संस्कार दूंगा कि उनमें परिवार की एकता और अखण्डता की ज्योत सदा प्रजवलित रहे। पर अगले ही पल फिर विचार आया कि क्या मैं इतना स्वार्थी हो सकता हूँ कि उनकी प्रगति और स्वच्छंदता में अपने बुढ़ापे की बेढ़ियाँ बाँधूं। आखिर पक्षी भी तो अपने बच्चों को सक्षम होने पर खुले आसमान में अपना जहान ढूढने की स्वतंत्रता देते हैं। तो फिर मेरे बच्चे क्यों इस अधिकार से वंछित रहें?
‘पास रहे या दूर रहे, बस दिलों के तार जुड़े रहें।’

किंतु अभी भी यह विचार व्याकुल कर रहा था कि एक बेटा इतना निष्ठुर कैसे हो सकता है कि अपने माता-पिता को तड़पता छोड़, उनकी सुद भी ना ले? और अपनी असमर्थता का मुखौटा ओढ़ कहे, “आई होप यू अंडरस्टेंड पापा!”

आखिर इस कड़वे फल का बीज कब पनपा होगा?
कहीं बच्चों में बढ़ती इस असंवेदनहीनता का कारण हमारी परवरिश में कोई त्रुटि तो नहीं? उनके इस दुर्व्यवहार के लिए एक माता-पिता के रुप में कहीं हम स्वयं ही तो जिम्मेदार नहीं?

आखिर कहीं ना कहीं हमने ही तो उन्हें ढाला है। उनके सोचने-समझने की बौद्धिक क्षमता, विचार, संस्कार आदि हमारी ही तो देन हैं। सही और गलत का आंकलन, उनके व्यवहार सब हमसे ही तो प्रभावित हुए हैं।
विचारों की इस बाढ़ ने मुझे अंदर तक झकझोर दिया। अनेकों घटनायें अचानक मस्तिष्क पटल पर जीवट हो उठी जब मैनें भी तो एक पिता के रुप में अपने बच्चों के समक्ष असर्थता व्यक्त करते हुए कहा है, “आई होप यू अंडरस्टेंड बेटा!”

ऐसे अनेकों छुट्टी के दिन, जब घूंमने के लिए पूरा परिवार तैयार होकर गाड़ी में सवार हो चुका होता और अचानक अस्पताल से फोन आता कि एक एमरजेंसी है और वह प्रोग्राम रद्द करना पड़ता। और जब बच्चे रोने लगते तो हर बार मैं यही तो समझाता, “किसी की जान का सवाल है, आई होप यू अंडरस्टेंड बेटा!” वार्षिकोत्सवों में उनके अभिनय देखे बिना जब अस्पताल भगना पड़ता था तब भी यही तो कहता था, “आई होप यू अंडरस्टेंड बेटा!” वह खिलौने जो दिला ना सका, वह घूमने की जगह जहाँ ले जा ना सका, वह समय जो उसे दे ना सका और अपनी असर्थता ढाँकने के लिए यही तो कहा, “आई होप यू अंडरस्टेंड बेटा!”

आखिर हमारे बच्चे हम से ही तो सीखते हैं। नाम, पैसा, शौहरत इत्यादि की अभीलाषा में जब वे हमें अंधाधुंध भागते देखते हैं और सामंजस्य के अभाव में परिवार से दूर जाते देखते हैं तो शायद वे स्वयं ही सीख जाते हैं, कि क्या अतिमहत्वपूर्ण है।

इस आत्म अवलोकन का मकसद कतई उनकी निष्ठुरता की तरफदारी करना नहीं है। ना ही मैं ये कह रहा कि हम आजीविका नहीं कमायें या अपने बच्चों को संतुष्ट होना ना सिखायें। या उनकी हर नाजायज माँग को मान लें। किंतु एक माता-पिता के रुप में ये उचित और अनुचित का सामंजस्य तो हमें बिठाना ही होगा। यह विवेक तो हमें रखना ही होगा कि हमारे वाणी और व्यवहार से हमारे बच्चे वही सीखें जो उचित है। क्योंकि फल तो वही मिलेगा जिसका बीज हमने बोया है। आज अगर हम उनकी भावनाओं की कद्र करेंगें, तो वे भी हमारी भावनाओं की कद्र करना सीखेंगें। उनकी छोटी-बड़ी अनकही आवश्यकताओं की पूर्ती करेंगें तो वे भी हमारी चिंता करेंगें।

फिर शायद किसी को भी यह कहने की आवश्यकता ना पड़े, “आई होप यू अंडरस्टेंड!”

असफल बच्चे नहीं होते, हमारी परवरिश होती है।
दंश कांटों का झेलते है रिश्ते, गलती तो संस्कारों के बीज की होती है।

आइये एक बेहतर संसार की नींव रखें………………………..